यानी तब तक खाओ जब तक कि आपका पेट 80 प्रतिशत भरा न हो. जापानी मानते हैं कि ये मंत्र है मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने का और लंबी आयु का.
जापानी लोग दुनिया में सबसे ज्यादा जीने वाले लोग माने जाते हैं. ये ऐसे ही संभव नहीं हुआ. इतिहास की ओर झांककर देखा जाए तो उन्होंने समय के साथ अपनी आदतों में बदलाव किया. जैसे- छोटी प्लेटों में खाना खाना, धीरे-धीरे खाना, सब्जियों और सलाद पर फोकस करना, खाना खाते समय शरीर के संकेतों पर ध्यान देना यानी जरूरत से ज़्यादा न खाने की लिमिट लगाना. जापान के ओकिनावा में ज्यादातर लोग इस डाइट को फॉलो करते हैं. ओकिनावा में हृदय रोग, कैंसर, और स्ट्रोक से होने वाली बीमारियों की दर कम है. यहां के लोग लंबा जीवन जीते हैं.
भोजन का संतुलन हमारे शरीर के लिए कितना अहम है इसका जिक्र भगवद्गीता में भी है. भोजन के बारे में गीता में बताया गया है कि भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है. ये तीन प्रकार हैं - सत्व, रजोगुण, और तामसिक.
भगवद्गीता में बताया गया है कि आहार शुद्ध होने पर ही अंत:करण शुद्ध होता है.
शाकाहार और मांसाहार में क्या अच्छा है और क्या बुरा है? इस बहस में पड़े बिना यहां ये देखना जरूरी है कि दुनिया में भोजन को लेकर क्या व्यवहार है इंसान का? आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो दुनिया में सिर्फ 5 फीसदी लोग विशुद्ध शाकाहारी हैं. बाकी के 95 फीसदी लोग किसी न किसी रूप में मांसाहार करते हैं. भारत में भोजन को लेकर बहस लंबे समय से होती आ रही है. खाने के बारे में बात करना वैसे तो लोग जरूरी नहीं समझते लेकिन जरूरी है क्योंकि तमाम मेडिकल रिसर्च और पौराणिक ज्ञान इसे हमारे मानसिक और शारीरिक हेल्थ से जोड़कर ही देखते हैं इसलिए बात करना जरूरी हो जाता है.
भारत के आंकड़ों को अगर देखें तो यहां 24 फीसदी लोग शाकाहारी हैं, 9 फीसदी लोग वेगन हैं यानी मांसाहार के साथ-साथ दूध से बनी चीजें भी नहीं खाते. प्यू रिसर्च का एक डेटा कहता है कि 81 फीसदी इंडियन अपने खाने में मांस यानी मीट को शामिल नहीं करते, 8 फीसदी लोग pescatarians हैं यानी मीट नहीं खाते, मछली खाते हैं, एक अच्छी-खासी आबादी eggitarian भी है यानी जो लोग मांस और मछली नहीं खाते लेकिन अंडे को भोजन में शामिल रखते हैं. आप क्या खाते हैं इसका चयन आपका ही अधिकार है लेकिन जो आपके मन को तसल्ली दे, आत्मा को स्वीकार हो वही आपका भोजन हो.
अध्यात्मिक गुरु ओशो मानते थे कि अगर आप चिंता के भाव में भोजन कर रहे हैं तो मुमकिन है कि वह खाना आपके लिए जहर का काम करे. वहीं अगर आप पूरे आनंद भाव से खा रहे हैं, तो कई बार संभावना भी है कि खाने में मिला जहर भी आप पर असर ना करे. ओशो भोजन को लेकर कहते थे कि एक स्वस्थ शरीर के लिए ये जरूरी नहीं है कि आप क्या खा रहे हो, जरूरी ये है कि आप किस मनोदशा में खा रहे हो. खाते वक्त आपका चित्त कैसा है, मतलब कि भोजन के वक्त आप खुश हो, उदास हो, क्रोधित हो या फिर किसी चिंता में हो. ओशो के मुताबिक आप जिस मनोदशा में भोजन करते हैं उसका वैसा ही असर आपकी सेहत और शरीर पर पड़ता है.
यहां बुद्धा डाइट का जिक्र करना भी जरूरी है. बौद्ध आहार मुख्य रूप से शाकाहारी होता है, जिसमें पौधे आधारित खाद्य पदार्थ शामिल हैं और मांस, मछली, मुर्गी, प्याज, लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों को शामिल नहीं किया गया है. बौद्ध आहार का मूल सिद्धांत स्वस्थ भोजन, सही समय पर और सही मात्रा में भोजन को शामिल करके एक स्वस्थ जीवन शैली जीना है.
भगवद् गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि पत्ते, फल और पानी खाना भी हमें स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त है.
खाने की बात हो गई तो पीने पर आते हैं. जल जीवन के लिए जरूरी है लेकिन अंग्रेजी के शब्द Drink को कोई पानी पीने से जोड़ता ही नहीं. इसका मतलब सीधे-सीधे शराब पीने से लगा लिया जाता है. इसके आंकड़े अगर देखें तो भारत और दुनियाभर में शराब पीने वालों की तादाद असंख्य है.
सरकारी आंकड़े कहते हैं कि भारत में 21 फीसदी पुरूष और 2 फीसदी महिलाएं शराब पीने के आदी हैं, दुनिया का आंकड़ा तो इससे भी ज्यादा है. एक शोध के मुताबिक भारत में हर आदमी पर औसतन 4.9 लीटर शराब की खपत है, इसमें जो नहीं पीते उनकी कमी पीने वाले पूरी करते हैं. दुनिया का आंकड़ा और भी ज्यादा है यानी हर व्यक्ति का औसन 5.5 लीटर. शराब, ड्रग्स और नशे से बीमार होने वालों की संख्या तो असंख्य है लेकिन हर साल दुनिया में 9 लाख लोग अल्कोहल के कारण अपनी जान गंवाते हैं.
मतलब आप क्या खाते हैं, क्या पीते हैं इसका चयन बहुत सावधानी से करना जरूरी है क्योंकि यही चीजें आपका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य तय करेंगी.
