Saturday, 28 December 2024

जो नहीं मिला शायद उससे कुछ बड़ा आपके लिए इंतजार कर रहा हो...


कई बार अपनी मनचाही चीजें नहीं मिलने पर हम दुखी हो जाते हैं. हमें अपना जीवन विफल होते लगने लगता है. हम सोचते हैं कि शायद ईश्वर के हम प्रिय नहीं हैं. लेकिन जो लोग प्रकृति के काम करने के तरीके को समझते हैं वे जानते हैं कि समय की अपनी योजना होती है. वो आपके लिए आपकी मनचाही चीजें दे न दे लेकिन वो जरूर देती है जिसके लिए आपको धरती पर लाया गया है. जिसके लिए आपका बृहद रोल कुदरत ने तय कर रखा है.

भगवान राम की अगले दिन ताजपोशी होनी थी, अयोध्या में भव्य तैयारियां हो रखी थीं. लेकिन अचानक बाधा आ गई, राजा दशरथ को रानी कैकेई की शर्तें माननी पड़ीं और राम को सिंहासन की बजाय जंगल की ओर प्रस्थान करना पड़ा. अगले 14 साल राजयोग की जगह जंगल में भटकना, तमाम जंगली जानवरों और असुरों का संकट झेलना लिखा था उनकी किस्मत में, और आखिरकार महाबली लंकाधिपति रावण से भिड़ना पड़ा.



कुदरत की ओर से राम के सामने चुनौतियां आती गईं और उन्होंने अपने साहस, कूटनीति और पराक्रम से हर चुनौती को पार किया. हमेशा सत्य और अच्छाई पर टिके रहे. उन्होंने लंकापति रावण का खात्मा कर कई राज्यों को उसके अत्याचार से बचाया, सीता के मान की रक्षा की. तभी दुनिया ने उन्हें भगवान का दर्जा दिया. सोचिए अगर वे तब अयोध्या का राजा बन गए होते तो बाकी आम राजाओं की तरह ही रह जाते लेकिन उनकी चुनौतियों ने उन्हें ऐतिहासिक स्थान दिलाया. जिनकी आज हजारों साल बाद भी कोई दूसरी मिसाल नहीं है.

यही हालात, स्वामी विवेकानंद के जीवन में भी आया था. साल 1884 में जब वे नरेंद्र नाथ हुआ करते थे, अभी-अभी स्नातक की परीक्षा पास की थी. पिता के अचानक निधन से परिवार का जिम्मा उनके ऊपर  गया. विवेकानंद नौकरी के लिए कोलकाता के दफ्तरों में दिनभर चक्कर लगाया करते थे. हर तरफ से निराशा हाथ लग रही थी. कभी-कभी खाली पेट सिर्फ पानी पीकर पार्क में बैठकर सोचा करते कि क्या कुदरत ने उन्हें इस हाल के लिए बनाया है. तब शायद वे कुदरत के प्लान से अनभिज्ञ थे.



वक्त बदला, कुदरत की सुई घूमी. विवेकानंद उस ओर बढ़ चले जिसके लिए उन्हें इस धरती पर लाया गया था. वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए. अब वे धर्म पथ पर बढ़ चले. उन्होंने पूरे भारत का दौरा किया और धार्मिक प्रयासों से सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की. कश्मीर से कन्याकुमारी तक, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से लेकर साउथ में रामेश्वर तक उन्होंने सनातन धर्म की जड़ें मजबूत कीं. 

फिर वे अमेरिका की ओर बढ़ चले. शिकागो समेत पूरा अमेरिका, रोम, ब्रिटेन, जर्मनी घूम-घूमकर उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार किया. वहां वेदांत की संस्थाएं स्थापित की. असंख्य अमेरिकी और ब्रिटिश लोग उनके भक्त बनकर सनातन धर्म के लिए काम करने लगे. कोलकाता में वेलूर मठ स्थापित करने में विदेशियों ने जमकर मेहनत की. कई विदेशी भक्त अमेरिका-यूरोप में काम करने लगे तो कई अपना घर-बार छोड़कर सनातन धर्म की सेवा के लिए इंडिया में आ बसे.

दुनियाभर में स्वामी विवेकानंद ने धर्म की जड़ें जमा दीं वो भी उस काल में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था. अंग्रेज मूल के लोग इंडियंस को बराबरी का समझते तक नहीं थे. सोचिए अगर विवेकानंद को संघर्ष के दिनों में कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल गई होती तो? वे आम गृहस्थ की तरह सांसारिक झंझटों में उलझकर ही रह जाते. उनका विराट स्वरूप दुनिया देख ही नहीं पाती.

इसीलिए हमारे जीवन में भी जब चीजें कुछ ठीकठाक नहीं चल रही हों तो हमें समझने की जरूरत है कि कुदरत का कुछ और ही प्लान है हमारे लिए. जिसे शायद अभी हम देख नहीं पा रहे हों लेकिन कुछ बड़ा हमारा इंतजार कर रहा है. इसी सोच के साथ अगर आप विपरित हालातों का सामना करें तो आपके अंदर एक अलग तरह की एनर्जी दिखेगी और आप समस्याओं के दौर को पार कर जीवन के नए फेज में कब आ जाएंगे आपको पता भी नहीं चलेगा.

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