हम इंसान अक्सर जीवन में नयापन की तलाश में लगे रहते हैं. इस दौरान हम कई चीजों से होकर गुजरते हैं. कुछ चीजें और आदतें हमारे साथ हो लेती हैं और कुछ चीजें समय के साथ पीछे छूट जाती हैं. हमेशा नई चीजें और आदतें हमें आकर्षित करती हैं लेकिन समय के साथ फिर हम खुद को उसी बोझिल स्थिति में पाते हैं और फिर नयापन की तलाश शुरू कर देते हैं. आखिर ये समयचक्र क्यों चलते रहता है और हम अक्सर जीवन के उसी मोड़ पर खुद को क्यों पाते हैं जहां से हम कुछ समय पहले गुजर चुके होते हैं? इसके पीछे हमारे फैसलों और हमारी आदतों की एक लंबी श्रृंखला काम कर रही होती है जिन्हें हम-अपनाते हैं और कभी-कभी बीच राह में छोड़ते चले जाते हैं.
आइए, इसे एक नजरिए से देखने की कोशिश करते हैं. क्या आपको पता है कि साल के पहले दिन बल्कि साल शुरू होने से पहले वाली रात... दुनिया भर में सबसे अधिक चीजें तय होती हैं, सबसे सख्त फैसले होते हैं. अमेरिका में करीब 38 फीसदी लोग इस एक रात को कोई न कोई फैसला लेते हैं खुद को लेकर. यानी 38 फीसदी लोग न्यू ईयर रिजॉलुशन लेते हैं. हमारे देश में भी कमोबेश आंकड़ा कुछ ऐसा ही होगा. सबसे पहले 4000 साल पहले बेबिलोन सभ्यता के लोगों ने इस परंपरा की शुरुआत की थी. तबसे आजतक न्यू ईयर रिजॉलुशन की ये परंपरा दुनियाभर में ऐसे ही चल रही है.
इसमें कई मजेदार फैक्ट हैं. न्यू ईयर रिजॉलुशन लेने वाले 52 फीसदी लोग एक सिंगल रिजॉलुशन लेते हैं, जबकि 47 फीसदी लोग एक से अधिक रिजॉलुशन लेते हैं. इनमें से 48 फीसदी लोग स्वास्थ्य संबंधी रिजॉलुशन लेते हैं जैसे कि ज्यादा व्यायाम करेंगे, टहलना शुरू करेंगे, खाना कंट्रोल में और पौष्टिक खाएंगे..आदि-आदि. 23 फीसदी लोग करियर एंबिशन को लेकर रिजॉलुशन लेते हैं, 19 फीसदी लोग शराब और दूसरी नशाखोरी छोड़ने को लेकर रिजॉलुशन लेते हैं. इनमें से 30 फीसदी के करीब लोग बिजनेस, फाइनेंसिंग, सेविंग, इनवेंस्टमेंट से जुड़े रिजॉलुशन तय करते हैं. कुछ फीसदी लोग परिवार को ज्यादा समय देने, सोशल बॉन्डिंग मजबूत करने जैसे रिजॉलुशन लेते हैं. कुछ फीसदी लोग मेंटल हेल्थ, हीलिंग, नकारात्मक बातों से दूर रहने जैसे साइकोलॉजिकल रिजॉलुशन लेते हैं...
ये सब आंकड़े देखने में कितने मजेदार लग रहे हैं. हम कितने कमिटेड दिख रहे हैं. साल बदलते ही हम नए संकल्प लेकर आगे बढ़ने को संकल्पित दिख रहे हैं. लेकिन आपको बता दें कि हम करोड़ों-अरबों लोग ये काम हर नए साल की रात करते हैं. हर साल फिर कुछ दिन बीतते ही ये आंकड़े बदलते चले जाते हैं. आप भी गौर कीजिएगा अपने पिछले कुछ सालों के अनुभवों को याद करके कुछ ऐसी ही वास्तविकता आपके सामने भी होगी.
अब आपको बताते हैं कि अच्छे से शुरू हुए साल में इन तय किए हुए फैसलों का अगले कुछ दिनों में क्या होता है? हममें से हर चार में से एक शख्स अगले एक हफ्ते में अपने रिजॉलुशन से डिग जाता है, यानी 25 फीसदी एक हफ्ते में अपने तय किए फैसले से हट चुके होते हैं. फरवरी आते-आते 43 फीसदी लोग अपने पुराने ढर्रे पर आ चुके होते हैं. दूसरा महीना बीतते-बीतते 81 फीसदी लोग अपने रिजॉलुशन को भूल चुके होते हैं और साल के आखिर तक केवल 9 फीसदी लोग अपने तय किए टारगेट को हासिल कर पाते हैं यानी 91 फीसदी लोग उस काम को पूरा नहीं कर पाते जो उन्होंने खुद के लिए तय किया था.
ये हश्र हम अपने खुद के लिए फैसलों के साथ करते हैं. और आखिरकार एक बोझिल शाम को हम बैठकर सोचते हैं कि लाइफ कितनी बोरिंग है. कुछ नया नहीं हो रहा है. फिर हम चल पड़ते हैं कुछ एंसाइटिंग की तलाश में. फिर हम कई सारे एक्साइटमेंट्स अपने आसपास जुटा लेते हैं ताकि फिर नया साल आने पर हम उसे छोड़ने का रिजॉलुशन सेट कर सकें. ऐसा हम पिछले कई साल से कर रहे हैं और हमारे जैसी कई पीढ़ियां पिछले कई दशकों से ऐसा ही करती रही हैं.

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