विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े कहते हैं कि दुनियाभर में 28 करोड़ लोग डिप्रेशन के शिकार हैं. यानी मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं. और अगर एक्सपर्ट्स की मानें तो इससे भी अधिक लोग ऐसे हैं जिन्हें ये परेशानी तो है लेकिन वे इसकी पहचान कर पाने में या तो सक्षम नहीं हैं या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर सामाजिक टैबू के चलते इसे स्वीकार नहीं करते और इनके इलाज से बचते रहते हैं. भारत में भी 5.66 करोड़ लोग डिप्रेशन के शिकार हैं.
डिप्रेशन के शिकार लोग सुसाइड भी सबसे ज्यादा करते हैं. दुनिया भर में एक साल में 8 लाख लोग सुसाइड कर अपनी जान दे देते हैं जिनमें से 20 फीसदी यानी एक लाख 60 हजार के आसपास भारतीय थे. यानी देश में औसतन हर घंटे 18 और रोज 450 लोग सुसाइड कर लेते हैं. परेशानियां जो भी रही हों लेकिन ये समस्याओं का हल तो नहीं है. आखिर ऐसे क्या हालात आते हैं कि लोग जीवन खत्म कर लेने का फैसला कर लेते हैं.
आखिर, मन के अंदर ऐसी कौन सी हलचल है जो डिप्रेशन-एंजाइटी जैसी समस्याओं को जन्म देती हैं? क्या इनका कोई हल नहीं है? क्या हमारे परिवार और समाज का तानाबाना इतना कमजोर हो गया है कि हम मुश्किलों में उलझते चले जाते हैं लेकिन किसी अपने को अपने दिल का हाल बता नहीं पाते? क्या हम इन मुश्किल हालात से उबर सकते हैं? दरअसल मुश्किल हालात में हमें ये सोचने पर फोकस करना चाहिए कि हल क्या है? न कि परेशानी से पीछा छुड़ाने के लिए खुदकुशी का रास्ता अपनाना उचित है.
मुश्किलें हम सब की जिंदगी में आती हैं. कई बार लोग उनके सामने बिखर से जाते हैं तो कई बार हम उनपर जीत हासिल कर पहले से भी मजबूत होकर उभरते हैं. कई लोगों के लिए मुश्किल वक्त फुल स्टॉप साबित होती है तो कई लोगों के लिए मुश्किल वक्त नए सिरे से उभरने का मौका साबित होती है. ये हमपर निर्भर करता है कि हम हालात को किस तरीके से संभालने की कोशिश करते हैं.
जिंदगी में जो लोग मुश्किलों के आगे सरेंडर कर देते हैं उनसे बस इतना कहना चाहेंगे कि- न एक जीत हमारा आखिरी पड़ाव हो सकती है और न एक हार. मुश्किलों के पार ही सफलता की मंजिल है. ये बिल्कुल एक अंधेरी सुरंग की भांति है जिसके दूसरे सिरे पर रोशनी भरी राह है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए सुरंग का अंधेरा भरा रास्ता तो पार करना ही होगा. जिंदगी बिल्कुल एक नदी की तरह है. नदी का उद्गम मुश्किल पहाड़ी इलाके में होती है, वहां से कंकरीली-पथरीली राह तय कर नदियां लोगों की प्यास मिटाती लंबी दूरी तय करती है और तब जाकर समंदर के साथ एकाकार हो पाती हैं. ऐसी ही हमारी जिंदगी भी है. मुश्किल राह के आगे सफलता की मंजिल है और उसे पाने के लिए मुश्किलों का पहाड़ तो पार करना ही होगा.
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक वे जो छोटी सी प्रॉब्लम आ आने पर घबरा जाते हैं और दुखी हो जाते हैं. दूसरे वह लोग होते हैं, चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें उनकी जिंदगी में आ जाए लेकिन वह हमेशा खुश रहते हैं. हर प्रॉब्लम में अपने आप को संभाल लेते हैं.
एक लड़के की कहानी आपको बताते हैं. यह कहानी ऐसी है कि आपके जीवन में हजारों मुश्किलें या बड़ी परेशानियां क्यों ना आ जाएं लेकिन यह कहानी आपको हर मुश्किल में रहना और मुस्कुराना सिखा देगी.
एक 19 साल का लड़का सरकारी नौकरी के इंटरव्यू में गया. वहां उसे एक सवाल पूछा गया कि थायरॉइड ग्रंथि मनुष्य के शरीर में कहां होती है? उसे नहीं पता था. उसने कहा कि थायरॉइड घुटनों में होती है. उसे नॉकरी नही मिली. ये झटका उसे चुभ गया.
इंटरव्यू से बाहर निकल कर वह थाइरॉइड के बारे में सोच रहा था. उस लड़के ने पूरे 10 साल तक थाइरॉइड पर पीएचडी की, कारोबार शुरू किया और बड़ी थायरॉइड मेडिसिन कंपनी का मालिक बन गया. उसने एक मुश्किल को, एक झटके को अपनी सफलता का आधार बना लिया.

No comments:
Post a Comment