कृष्ण से बड़ा कोई पूर्ण पुरुष नहीं.
बचपन जिया तो ऐसा कि हरेक मां ने अपने बेटे को कन्हैया कहना शुरू कर दिया,
जवानी जी तो ऐसी कि प्रेम की मिसाल बन गए,
युद्ध रचाया तो ऐसा कि 5 निर्वासित लड़कों को विजेता बना दिया, और ज्ञान दिया तो गीता जैसा...
हमारी खुशी की कुंजी हमारे पास ही है. हमारी समस्याओं का समाधान हमारे पास ही है. इसके लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं है बल्कि खुद से खुद की पहचान कराने की जरूरत है. अपने अंदर और बाहर के तार को जोड़ने की जरूरत है. आइए Happy Science के जरिए मिलकर रास्तों को तय करते हैं, मुश्किलों को आसान बनाते हैं.
बड़े विद्वान कह गए हैं- 'वाणी चांदी है, मौन स्वर्ण है'.
जीवन में इसका संतुलन न केवल आपके मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. तभी बुद्ध, विवेकानंद, गांधी से लेकर ओशो तक ने मौन के महत्व पर जोर दिया है.
थॉमस हूड की एक कविता है जो जीवन में और संसार में मौन के महत्व को बताती है-
''वहां एक सन्नाटा है जहां कोई आवाज नहीं हो सकती,
ठंडी कब्र में- गहरे, गहरे समुद्र के नीचे,
या विस्तृत रेगिस्तान में जहां कोई जीवन नहीं पाया जाता,
जो मूक रहा है, और अभी भी गहरी नींद में सो रहा है;
कोई आवाज़ बंद नहीं है- कोई जीवन चुपचाप नहीं चलता,
लेकिन बादल और धुंधली छायाएं स्वतंत्र रूप से घूमती हैं,
जो कभी नहीं बोलीं, निष्क्रिय जमीन पर,
लेकिन हरे खंडहरों में, पुराने महलों की उजाड़ दीवारों में
जहां आदमी रहा है,
हालांकि भूरे लोमड़ी या जंगली लकड़बग्घा पुकारते हैं,
और उल्लू, जो लगातार बीच-बीच में उड़ते रहते हैं,
प्रतिध्वनि पर चीखते हैं, और धीमी हवाएं विलाप करती हैं,
वहां सच्चा मौन है, आत्म-चेतन और अकेला ।।।''
हम सब एक बोलते हुए समाज में रहते हैं, एक शोर भरे समाज में... जहां हमारे पहले शब्द बोलने का भी जश्न मनाया जाता है. आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि एक इंसान दिन भर में औसतन 20 हजार शब्द बोलता है. बोलने से भी अलग हमारे मन में विचारों का शोर ज्यादा तेज रहता है. एक स्टडी के अनुसार एक इंसान के मन में रोज 6 हजार से अधिक विचार आते हैं.
हमारे शब्द और हमारा बोलना बहुत मायने रखता है. लेकिन एक और पहलू है जीवन का. और वो है मौन... इन सबका मर्म इस सवाल के जवाब में छिपा है कि क्या मौन केवल वह स्थिति है जहां शब्दों की शून्यता होती है? आखिर क्या है मौन में कि उसपर सदियों से इतनी चर्चा होती आई है?
मौन स्वर्णिम है लेकिन मुश्किल भी है. आप किसी ऐसी जगह एक घंटे बैठकर देखें जहां कोई एक शब्द भी नहीं बोलता... आपको मौन शोर मचाता हुआ, आपको बेचैन करता हुआ दिखेगा. मौन को अपनाना इतना आसान नहीं है. दिल्ली के लोटस टेंपल के अंदर जहां कुछ नहीं है मौन के सिवा, कुछ ही मिनटों में लोग भागने लगते हैं उठकर. क्योंकि मौन का सामना करना उतना आसान नहीं है.
अमेरिका के मिनिसोटा में एनीकोटिक चैंबर नाम से एक कमरा बनाया गया है. यह एक लेबोरेटरी है. गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में यह दुनिया की सबसे शांत जगह है. एनीकोटिक रूम का मतलब है कि यहां पर कोई प्रतिध्वनि नहीं होती है यानी आवाज यहां गूंजती नहीं है. क्योंकि यह कमरा 99.99 प्रतिशत ध्वनि को अवशोषित कर लेता है. अगर शांति को एक पैरामीटर में मापा जाए तो सोते समय हमारे बेडरूम में 30 डेसीबल शांति रहती है, जबकि इस लेबोरेटरी में माइनस 9 डेसीबल की शांति रहती है.
यहां इतनी शांति है कि कई लोगों ने कोशिश की यहां समय बिताने की लेकिन 45 मिनट से ज्यादा यहां कोई टिक नहीं पाया. इस कमरे में जब कोई व्यक्ति सांस भी लेता है, उसके दिल की धड़कन, धमनियों में बहता खून, फेफड़े की आवाज सब कुछ सुनाई देती है और यह सब सुनना एक नॉर्मल इंसान को पागल बना सकता है. बहुत बहादुर लोगों ने वहां पर रहने की कोशिश की लेकिन 45 मिनट से ज्यादा कोई इंसान वहां पर टिक नहीं पाया. इतना शोर होता है मौन में.
"मौन मुनि मन राख्यो..." का अर्थ है कि मौन रहने से मन शांत होता है और यह एक साधु के लिए, या किसी भी व्यक्ति के लिए जो आंतरिक शांति की तलाश में है, एक महत्वपूर्ण अभ्यास है. लेकिन मौन का अर्थ केवल बाहरी चुप्पी नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक विकास भी है. मौन को अध्यात्म में एक महत्वपूर्ण अभ्यास माना जाता है, जो व्यक्ति को अपने भीतर की आवाज को सुनने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है. इससे जहां मानसिक तनाव कम होता है, वहीं क्रोध और अहंकार कम होते हैं, और व्यक्ति में धैर्य और सहनशीलता बढ़ती है. श्रीमद्भगवद्गीता में मौन को योग और तप का एक रूप बताया गया है.
मौन रहने के कई वैज्ञानिक लाभ भी होते हैं- जैसे कि तनाव कम होना, एकाग्रता में सुधार, और रचनात्मकता में वृद्धि, साथ ही यह कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करने, नींद की गुणवत्ता में सुधार करने और बेहतर रक्तचाप नियंत्रण में मदद करता है.
मौन का एक और फायदा है. ओशो कहते हैं- आपके जीवन के अधिकांश क्लेश आपके बोलने से होता है. आपसे की जाने वाली अधिकांश बातों पर आप प्रतिक्रिया देते हैं जबकि उनमें से केवल 10 प्रतिशत ही ऐसी होती हैं जिनमें आपकी प्रतिक्रिया की जरूरत होती है. आप प्रयोग करके देखें जैसे-जैसे आप मौन को अपनाते जाएंगे जीवन के क्लेश कम होते चले जाएंगे. ओशो कहते हैं- मौन करुणा को जगाता है. जब तुम मौन रहना सीख जाओगे, तब सारे प्रश्न गिर जायेंगे. जब अकेले हो तो पूरी तरह से मौन में बैठो, और स्वयं को देखो. अपनी श्वास को देखो, अपने विचारों को देखो, अपनी स्मृतियों को देखो. अपने को संपूर्णता में देखो, बिना किसी दखल के; बस देखना. ओशो के मुताबिक, प्रेम और ध्यान को साथ-साथ सीखना चाहिए.
मौन व्रत की प्राचीन भारतीय परंपरा भी रही है जो आत्म-नियंत्रण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देती है.
ऋषि-मुनि और साधु-संत अपने जीवन में मौन के महत्व को समझते थे. इससे व्यक्ति को अपने विचारों और वाणी पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है, जिससे मानसिक शांति और आत्म-संयम प्राप्त होता है. एकाग्रता को बढ़ाने में भी यह मदद करता है.
बुद्ध, विवेकानंद और गांधी ये तीनों मौन को जीवन का एक जरूरी हिस्सा मानते थे. मौन और ध्यान के जरिए ज्ञान और संयम पर इन्होंने लगातार काम किया. बुद्ध मौन को ज्ञान और आत्म-जागरूकता की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग मानते थे, जो मन को शांत करके आंतरिक सत्य को प्रकट करता है. वहीं स्वामी विवेकानंद मौन को क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा मानते थे. महात्मा गांधी तो हर सोमवार मौन व्रत रखते थे, जिसमें वे किसी से बात नहीं करते थे, और जरूरत पड़ने पर वे लिख लेते थे, लेकिन बोलते बिल्कुल नहीं थे. उनका मानना था कि मौन व्रत आपकी वाणी को संयमित और आत्मा को शुद्ध करता है. मौन व्रत के माध्यम से वे बाहरी दुनियावी चीजों को मन से निकालना चाहते थे और शांति प्राप्त करना चाहते थे.
तमाम जीवों में मनुष्य विशेष रूप से मन प्रधान जीव है. वह जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है. हम इंसान बाकी जीवों से अलग हैं सिर्फ अपने मस्तिष्क के कारण, अपने मन के कारण और अपनी सोचने-समझने की क्षमता के कारण... क्योंकि हमारे विचार ही हमें डिफाइन करते हैं, हमारी पर्सनैलिटी को हमारे आसपास तैर रहे विचार ही गढ़ते हैं.
इसीलिए सिगमंड फ्रायड कहते थे- मनुष्य तब तक शक्तिशाली होता है जब तक वह किसी मज़बूत विचार का प्रतिनिधित्व करता है. इतिहास गवाह है कि दुनिया का हर सशक्त इंसान अपनी सही ताकत तभी पहचानता है जब वो अपने विचारों को मजबूत करता है. राम अपनी मर्यादा, करुणा, दया, और धर्मपरायणता, तो बुद्ध त्याग के विचार से, गांधी सत्य और अहिंसा के विचार से तो विवेकानंद धर्म के ज्ञान और तप से खुद को दुनिया में सबसे अलग खड़ा कर पाए...
अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि हमारे भी जीवन पर उन विचारों का सीधा असर दिखता है जिनका हमें रोज समना करना होता है. मसलन हम जिनके बीच रहते हैं उनके विचार क्या हैं, हम क्या खाते हैं, हम क्या देखते-सुनते और बोलते हैं, हम क्या पढ़ते हैं? ये सारी चीजें हमें गढ़ रही होती हैं. विचार के रूप में और व्यक्तित्व के रूप में भी.
इसीलिए अरस्तु ने इंसान को सामाजिक जीव बोला है तो सिगमंड फ्रायड ने मानसिक जीव. भगवद्गीता में भी कहा गया है कि इंद्रियों के अधीन होने से मनुष्य के जीवन में विकार और परेशानियां आती हैं और जो अपने मन को सभी विकारों से मुक्त कराते चला जाता है वह निर्भय होते चला जाता है.
यही मन का विज्ञान है. हमारे मन की ताकत और हमारे विचार ही हमें बुलंदियों की ओर लेकर जाते हैं. इसलिए जैसे हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए खाना और व्यायाम पर फोकस करते हैं वैसे ही हमें अपने मन को भी मजबूत करने के लिए लगातार ज्ञान और अच्छे विचारों की खुराक देने की जरूरत होती है.
कई बार अपनी मनचाही चीजें नहीं मिलने पर हम दुखी हो जाते हैं. हमें अपना जीवन विफल होते लगने लगता है. हम सोचते हैं कि शायद ईश्वर के हम प्रिय नहीं हैं. लेकिन जो लोग प्रकृति के काम करने के तरीके को समझते हैं वे जानते हैं कि समय की अपनी योजना होती है. वो आपके लिए आपकी मनचाही चीजें दे न दे लेकिन वो जरूर देती है जिसके लिए आपको धरती पर लाया गया है. जिसके लिए आपका बृहद रोल कुदरत ने तय कर रखा है.
भगवान राम की अगले दिन ताजपोशी होनी थी, अयोध्या में भव्य तैयारियां हो रखी थीं. लेकिन अचानक बाधा आ गई, राजा दशरथ को रानी कैकेई की शर्तें माननी पड़ीं और राम को सिंहासन की बजाय जंगल की ओर प्रस्थान करना पड़ा. अगले 14 साल राजयोग की जगह जंगल में भटकना, तमाम जंगली जानवरों और असुरों का संकट झेलना लिखा था उनकी किस्मत में, और आखिरकार महाबली लंकाधिपति रावण से भिड़ना पड़ा.
कुदरत की ओर से राम के सामने चुनौतियां आती गईं और उन्होंने अपने साहस, कूटनीति और पराक्रम से हर चुनौती को पार किया. हमेशा सत्य और अच्छाई पर टिके रहे. उन्होंने लंकापति रावण का खात्मा कर कई राज्यों को उसके अत्याचार से बचाया, सीता के मान की रक्षा की. तभी दुनिया ने उन्हें भगवान का दर्जा दिया. सोचिए अगर वे तब अयोध्या का राजा बन गए होते तो बाकी आम राजाओं की तरह ही रह जाते लेकिन उनकी चुनौतियों ने उन्हें ऐतिहासिक स्थान दिलाया. जिनकी आज हजारों साल बाद भी कोई दूसरी मिसाल नहीं है.
यही हालात, स्वामी विवेकानंद के जीवन में भी आया था. साल 1884 में जब वे नरेंद्र नाथ हुआ करते थे, अभी-अभी स्नातक की परीक्षा पास की थी. पिता के अचानक निधन से परिवार का जिम्मा उनके ऊपर गया. विवेकानंद नौकरी के लिए कोलकाता के दफ्तरों में दिनभर चक्कर लगाया करते थे. हर तरफ से निराशा हाथ लग रही थी. कभी-कभी खाली पेट सिर्फ पानी पीकर पार्क में बैठकर सोचा करते कि क्या कुदरत ने उन्हें इस हाल के लिए बनाया है. तब शायद वे कुदरत के प्लान से अनभिज्ञ थे.
वक्त बदला, कुदरत की सुई घूमी. विवेकानंद उस ओर बढ़ चले जिसके लिए उन्हें इस धरती पर लाया गया था. वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए. अब वे धर्म पथ पर बढ़ चले. उन्होंने पूरे भारत का दौरा किया और धार्मिक प्रयासों से सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की. कश्मीर से कन्याकुमारी तक, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से लेकर साउथ में रामेश्वर तक उन्होंने सनातन धर्म की जड़ें मजबूत कीं.
फिर वे अमेरिका की ओर बढ़ चले. शिकागो समेत पूरा अमेरिका, रोम, ब्रिटेन, जर्मनी घूम-घूमकर उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार किया. वहां वेदांत की संस्थाएं स्थापित की. असंख्य अमेरिकी और ब्रिटिश लोग उनके भक्त बनकर सनातन धर्म के लिए काम करने लगे. कोलकाता में वेलूर मठ स्थापित करने में विदेशियों ने जमकर मेहनत की. कई विदेशी भक्त अमेरिका-यूरोप में काम करने लगे तो कई अपना घर-बार छोड़कर सनातन धर्म की सेवा के लिए इंडिया में आ बसे.
दुनियाभर में स्वामी विवेकानंद ने धर्म की जड़ें जमा दीं वो भी उस काल में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था. अंग्रेज मूल के लोग इंडियंस को बराबरी का समझते तक नहीं थे. सोचिए अगर विवेकानंद को संघर्ष के दिनों में कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल गई होती तो? वे आम गृहस्थ की तरह सांसारिक झंझटों में उलझकर ही रह जाते. उनका विराट स्वरूप दुनिया देख ही नहीं पाती.
इसीलिए हमारे जीवन में भी जब चीजें कुछ ठीकठाक नहीं चल रही हों तो हमें समझने की जरूरत है कि कुदरत का कुछ और ही प्लान है हमारे लिए. जिसे शायद अभी हम देख नहीं पा रहे हों लेकिन कुछ बड़ा हमारा इंतजार कर रहा है. इसी सोच के साथ अगर आप विपरित हालातों का सामना करें तो आपके अंदर एक अलग तरह की एनर्जी दिखेगी और आप समस्याओं के दौर को पार कर जीवन के नए फेज में कब आ जाएंगे आपको पता भी नहीं चलेगा.
साहिर लुधियानवी लिखते हैं-
संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
इक धुंध से आना है, इक धुंध में जाना है
ये राह कहां से है, ये राह कहां तक है
ये राज़ कोई राही, समझा है न जाना है
इक पल की पलक पर है, ठहरी हुई ये दुनिया
इक पल के झपकने तक, हर खेल सुहाना है
क्या जाने कोई किस पर, किस मोड़ पर क्या बीते
इस राह में ऐ राही, हर मोड़ बहाना है
हम लोग खिलौना हैं, इक ऐसे खिलाड़ी का
जिस को अभी सदियों तक, ये खेल रचाना है...
इस दुनिया में कई तिलिस्म हैं जिन्हें अबतक कोई सुलझा नहीं सका है और लगता है आगे भी ये ऐसे ही बने रहेंगे. आप सोचकर देखिए सुबह से शाम तक आप तमाम लोगों से मिलते हैं, आपके नजरिए से कई लोग सही और कई गलत लगते होंगे लेकिन क्या आपने देखा है कि कोई सामने से आकर कहे कि- 'हां, मैं गलत हूं और मैं अपने में सुधार करूंगा ताकि किसी को मुझसे दिक्कत नहीं हो.' नहीं न, सब अपनी कहानी में सही होते हैं. आप भी सोचकर देखिए अपनी हर कहानी में आप भी खुद को सही मानते मिलेंगे.
तो जब सब सही हैं दुनिया में तो फिर गलत कौन है? आखिर इतनी परेशानिया हैं हमारी पर्सनल लेवल पर और सामाजिक लेवल पर तो कहीं न कहीं कोई न कोई गलत पक्ष में तो है? अगर सब लोग इस बात को समझ लें तो दुनिया की सारी समस्याएं एक झटके में खत्म हो जाएं...लेकिन क्या ऐसा होता दिख रहा? नहीं. क्या है कारण और क्या है समााधान. चलिए थोड़ा इसे आध्यात्मिक पक्ष से समझने की कोशिश करते हैं...
12वीं सदी में ही रूमी ने लिख दिया था-
''पता है
यहां से बहुत दूर, गलत और सही के पार,
एक मैदान है.. मैं वहां मिलूंगा तुझे…
तुम, तुमसे मिलना, तुम्हारे बारे में सोचना,
सारी दुनिया भर के काम छोड़ कर तुमसे मिलना,
जो कभी नहीं किया, वो करना… सब,
सब गलत है…
लेकिन अगर गलत है तो गलत लग क्यूं नहीं रहा..
कहां है ये सही और गलत…? जहां मैं हूं, वहां से कुछ सफ़ेद या काला नहीं है…
सब कुछ, कई रंगों का है, सब कुछ, हर पल , नया रंग ओढ़ता है..
सब कुछ…. सही भी है, और गलत भी…
मेरी सारी दुनिया ही, उस सही और गलत के पार का मैदान है…
और यहां, इस मैदान में, मुझे वो सब लोग मिलते हैं, जो मेरी तरह, सबरंग में देखते हैं..
सब की आंखें ख़राब हैं… दिमाग भी… सब एक जैसे हैं…''
हम अक्सर खुद को इस उलझन में पाते हैं कि जीवन में क्या चीजें सही दिशा में हैं या नहीं? साथ ही ये भी कि सही क्या है और गलत क्या है? हमें किस राह पर होना चाहिए? हमसे जुड़ी चीजें कहीं गलत राह पर तो नहीं हैं? आपको इन उलझनों का जवाब खुद खोजना होगा. अपने इर्द-गिर्द खोजना होगा. दूसरों के अनुभवों से आपकी जिंदगी के सवाल हल नहीं होंगे. आपको अपने जीवन को सरलता की ओर ले जाना होगा.
हां, आप दूसरों की जिंदगी की समस्याओं और उनके समाधान को कॉपी नहीं कर सकते लेकिन उनके अनुभवों से जरूर सीख सकते हैं. कैसे? सरल होकर, खुद को थोड़ा हल्का करके... आखिर ज्यादा बोझ लेकर जाना कहां है? ज्यादा लोड लेकर करना क्या है?
स्वेट माडर्न लिखते हैं-
'मैं प्रकृति के निकट रहने का यत्न करता हूं. अपने जीवन में उसका अनुकरण करता हूं. फल यह मिलता है कि खूब निद्रा आती है. पाचन शक्ति भी बनी रहती है. सभी साम्थर्य अपने पूरे वेग में रहता है. सरलता और परिश्रम का यही सबसे बड़ा इनाम है...'
इसका जवाब आपको खुद खोजना होगा. जीवन में सही गलत में उलझने की बजाय सरल रास्ते आपको हमेशा बेहतरी की ओर ले जाएंगे. स्वामी विवेकानंद कहते हैं-
'जो भी चीज आपको शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाती हैं, उसे जहर समझकर अस्वीकार कर दीजिए.'
वैसे, भी सही-गलत का ये सवाल कोई आज का नहीं है, सदियों पहले भी इंसान इसी उधेर-बुन में था. किसी ने एक संत के दरबार में ये सवाल पूछा. संत ने चेहरे पर चिर शांति और मुस्कान लाते हुए कहा-
'सही-गलत में फर्क करना इतना मुश्किल तो नहीं है. जो करने से दिल का बोझ बढ़े वो गलत और जो करने से दिल को इत्मीनान आए वो सही...'
कृष्ण से बड़ा कोई पूर्ण पुरुष नहीं. बचपन जिया तो ऐसा कि हरेक मां ने अपने बेटे को कन्हैया कहना शुरू कर दिया, जवानी जी तो ऐसी कि प्रेम की मिसा...