Tuesday, 8 April 2025

मौन मुनि मन राख्यो...

बड़े विद्वान कह गए हैं- 'वाणी चांदी है, मौन स्वर्ण है'.


जीवन में इसका संतुलन न केवल आपके मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. तभी बुद्ध, विवेकानंद, गांधी से लेकर ओशो तक ने मौन के महत्व पर जोर दिया है.

थॉमस हूड की एक कविता है जो जीवन में और संसार में मौन के महत्व को बताती है-

''वहां एक सन्नाटा है जहां कोई आवाज नहीं हो सकती,

ठंडी कब्र में- गहरे, गहरे समुद्र के नीचे,

या विस्तृत रेगिस्तान में जहां कोई जीवन नहीं पाया जाता,

जो मूक रहा है, और अभी भी गहरी नींद में सो रहा है;

कोई आवाज़ बंद नहीं है- कोई जीवन चुपचाप नहीं चलता,

लेकिन बादल और धुंधली छायाएं स्वतंत्र रूप से घूमती हैं,

जो कभी नहीं बोलीं, निष्क्रिय जमीन पर,

लेकिन हरे खंडहरों में, पुराने महलों की उजाड़ दीवारों में

जहां आदमी रहा है,

हालांकि भूरे लोमड़ी या जंगली लकड़बग्घा पुकारते हैं,

और उल्लू, जो लगातार बीच-बीच में उड़ते रहते हैं,

प्रतिध्वनि पर चीखते हैं, और धीमी हवाएं विलाप करती हैं,

वहां सच्चा मौन है, आत्म-चेतन और अकेला ।।।''

हम सब एक बोलते हुए समाज में रहते हैं, एक शोर भरे समाज में... जहां हमारे पहले शब्द बोलने का भी जश्न मनाया जाता है. आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि एक इंसान दिन भर में औसतन 20 हजार शब्द बोलता है. बोलने से भी अलग हमारे मन में विचारों का शोर ज्यादा तेज रहता है. एक स्टडी के अनुसार एक इंसान के मन में रोज 6 हजार से अधिक विचार आते हैं.

हमारे शब्द और हमारा बोलना बहुत मायने रखता है. लेकिन एक और पहलू है जीवन का. और वो है मौन... इन सबका मर्म इस सवाल के जवाब में छिपा है कि क्या मौन केवल वह स्थिति है जहां शब्दों की शून्यता होती है? आखिर क्या है मौन में कि उसपर सदियों से इतनी चर्चा होती आई है?

मौन स्वर्णिम है लेकिन मुश्किल भी है. आप किसी ऐसी जगह एक घंटे बैठकर देखें जहां कोई एक शब्द भी नहीं बोलता... आपको मौन शोर मचाता हुआ, आपको बेचैन करता हुआ दिखेगा. मौन को अपनाना इतना आसान नहीं है. दिल्ली के लोटस टेंपल के अंदर जहां कुछ नहीं है मौन के सिवा, कुछ ही मिनटों में लोग भागने लगते हैं उठकर. क्योंकि मौन का सामना करना उतना आसान नहीं है. 

अमेरिका के मिनिसोटा में एनीकोटिक चैंबर नाम से एक कमरा बनाया गया है. यह एक लेबोरेटरी है. गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में यह दुनिया की सबसे शांत जगह है. एनीकोटिक रूम का मतलब है कि यहां पर कोई प्रतिध्वनि नहीं होती है यानी आवाज यहां गूंजती नहीं है. क्योंकि यह कमरा 99.99 प्रतिशत ध्वनि को अवशोषित कर लेता है. अगर शांति को एक पैरामीटर में मापा जाए तो सोते समय हमारे बेडरूम में 30 डेसीबल शांति रहती है, जबकि इस लेबोरेटरी में माइनस 9 डेसीबल की शांति रहती है.

यहां इतनी शांति है कि कई लोगों ने कोशिश की यहां समय बिताने की लेकिन 45 मिनट से ज्यादा यहां कोई टिक नहीं पाया. इस कमरे में जब कोई व्यक्ति सांस भी लेता है, उसके दिल की धड़कन, धमनियों में बहता खून, फेफड़े की आवाज सब कुछ सुनाई देती है और यह सब सुनना एक नॉर्मल इंसान को पागल बना सकता है. बहुत बहादुर लोगों ने वहां पर रहने की कोशिश की लेकिन 45 मिनट से ज्यादा कोई इंसान वहां पर टिक नहीं पाया. इतना शोर होता है मौन में.

"मौन मुनि मन राख्यो..." का अर्थ है कि मौन रहने से मन शांत होता है और यह एक साधु के लिए, या किसी भी व्यक्ति के लिए जो आंतरिक शांति की तलाश में है, एक महत्वपूर्ण अभ्यास है. लेकिन मौन का अर्थ केवल बाहरी चुप्पी नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक विकास भी है. मौन को अध्यात्म में एक महत्वपूर्ण अभ्यास माना जाता है, जो व्यक्ति को अपने भीतर की आवाज को सुनने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है. इससे जहां मानसिक तनाव कम होता है, वहीं क्रोध और अहंकार कम होते हैं, और व्यक्ति में धैर्य और सहनशीलता बढ़ती है. श्रीमद्भगवद्गीता में मौन को योग और तप का एक रूप बताया गया है.

मौन रहने के कई वैज्ञानिक लाभ भी होते हैं- जैसे कि तनाव कम होना, एकाग्रता में सुधार, और रचनात्मकता में वृद्धि, साथ ही यह कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करने, नींद की गुणवत्ता में सुधार करने और बेहतर रक्तचाप नियंत्रण में मदद करता है. 

मौन का एक और फायदा है. ओशो कहते हैं- आपके जीवन के अधिकांश क्लेश आपके बोलने से होता है. आपसे की जाने वाली अधिकांश बातों पर आप प्रतिक्रिया देते हैं जबकि उनमें से केवल 10 प्रतिशत ही ऐसी होती हैं जिनमें आपकी प्रतिक्रिया की जरूरत होती है. आप प्रयोग करके देखें जैसे-जैसे आप मौन को अपनाते जाएंगे जीवन के क्लेश कम होते चले जाएंगे. ओशो कहते हैं- मौन करुणा को जगाता है. जब तुम मौन रहना सीख जाओगे, तब सारे प्रश्न गिर जायेंगे. जब अकेले हो तो पूरी तरह से मौन में बैठो, और स्वयं को देखो. अपनी श्वास को देखो, अपने विचारों को देखो, अपनी स्मृतियों को देखो. अपने को संपूर्णता में देखो, बिना किसी दखल के; बस देखना. ओशो के मुताबिक, प्रेम और ध्यान को साथ-साथ सीखना चाहिए.

मौन व्रत की प्राचीन भारतीय परंपरा भी रही है जो आत्म-नियंत्रण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देती है. 

ऋषि-मुनि और साधु-संत अपने जीवन में मौन के महत्व को समझते थे. इससे व्यक्ति को अपने विचारों और वाणी पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है, जिससे मानसिक शांति और आत्म-संयम प्राप्त होता है. एकाग्रता को बढ़ाने में भी यह मदद करता है.

बुद्ध, विवेकानंद और गांधी ये तीनों मौन को जीवन का एक जरूरी हिस्सा मानते थे. मौन और ध्यान के जरिए ज्ञान और संयम पर इन्होंने लगातार काम किया. बुद्ध मौन को ज्ञान और आत्म-जागरूकता की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग मानते थे, जो मन को शांत करके आंतरिक सत्य को प्रकट करता है. वहीं स्वामी विवेकानंद मौन को क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा मानते थे. महात्मा गांधी तो हर सोमवार मौन व्रत रखते थे, जिसमें वे किसी से बात नहीं करते थे, और जरूरत पड़ने पर वे लिख लेते थे, लेकिन बोलते बिल्कुल नहीं थे. उनका मानना था कि मौन व्रत आपकी वाणी को संयमित और आत्मा को शुद्ध करता है. मौन व्रत के माध्यम से वे बाहरी दुनियावी चीजों को मन से निकालना चाहते थे और शांति प्राप्त करना चाहते थे.

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