यह शोध उन्होंने पोलैंड में किया था. वहां के हालात तो बहुत ही बुरे रहे थे. उन लोगों ने सैकड़ों लोगों को भूख से मरते देखा था, बम गिरने से शहरों को राख में तब्दील होते देखा था, लोगों को फांसी पर चढ़ते, कैदियों की यातना, परिवार के सदस्यों की हत्या/बलात्कार सब यातनाओं को झेला था. अगर वे नाजी सेना की यातना का शिकार होने से बच गए थे तो कुछ सालों बाद उन पर सोवियत ने चढ़ाई कर दी थी.
जब दाब्रोवस्की ने बचे हुए लोगों पर शोध किया तो उन्हें कुछ हैरानी भरी और कमाल की बात पता चली. काफी लोगों का मानना था कि युद्ध के अनुभव में हालांकि उन्होंने काफी दर्द और तकलीफें सही थीं, लेकिन उस अनुभव ने उन्हें बेहतर, ज्यादा जिम्मेदार और हां पहले से ज्यादा खुश रहना सिखाया था. बहुत से लोगों ने युद्ध से पहले के अपने जीवन को अलग बताया था. वे किसी की तारीफ नहीं करते थे, किसी से खुश नहीं थे, आलसी थे और छोटी-छोटी समस्याओं में घिरे रहते थे.
युद्ध के बाद उनमें एक विश्वास आया. वे खुद को लेकर ज्यादा निश्चित हो पाए. हर चीज का शुक्रिया करने लगे और अब छोटी-छोटी समस्याएं उन्हें परेशान नहीं करती थीं.
यकीनन युद्ध के उनके अनुभव भयानक रहे थे, और वे पीड़ित उनकी वजह से बिल्कुल भी खुश नहीं थे. बहुत से दिलों के जख्म अभी भी ताजा थे. लेकिन कुछ ने उन जख्मों का इस्तेमाल अपनी जिंदगी में शक्तिशाली तरीके से कर लिया था. इस परिवर्तन में वे अकेले नहीं थे. हममें से बहुत से लोग मुश्किल समय में अपना बेस्ट शॉट दे पाते हैं. हमारा दर्द अक्सर हमें मजबूत करता है, हमें ज्यादा लचीला और ज्यादा स्थिर बनाता है.

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