बुरा भी आता है, भला भी आता है
ठहरता नहीं वक्त गुजर ही जाता है...
जीवन एक रहस्य है, जिसको जीना है, एंजॉय करना है. जिंदगी है तो समस्याएं तो आती ही रहेंगी लेकिन उस पर आपका रिएक्शन तय करेगा कि उसमें से आप टूटकर निकलेंगे या मुस्कराते हुए विजेता की तरह निकलेंगे. याद रखिए मुसीबतें आती हैं जीवन में परिवर्तन करने के लिए.
उम्मीद है तो रास्ता है. हमेशा याद रखें हमारी आखिरी उम्मीद हम स्वयं हैं. और जब तक हम हैं उम्मीद कायम है. लाइफ में जब भी कोई समस्या आए तो दो चीजें याद रखें-
1. ये समस्या कोई नई समस्या नहीं है. आपसे पहले लाखों लोगों को ये समस्या आ चुकी है.
2. हजारों-हजार लोग इस समस्या से कामयाबी के साथ बाहर निकल चुके हैं.
ओशो कहते हैं- जीवन को आनंदित होकर लेते रहो. मुश्किल समय भी आए तो गुजर ही जाएगा.
एक बड़ी प्रसिद्ध सूफी कहानी है.
एक सम्राट ने अपने सारे दरबारी लोगों और बुद्धिमानों को बुलाया और उनसे कहा– मैं कुछ ऐसा सूत्र चाहता हूं, जो छोटा हो, एक वचन में पूरा हो जाये और जो हर घड़ी में काम आए. दुख हो या सुख, जीत हो या हार, जीवन हो या मृत्यु सब में काम आये, तो तुम लोग ऐसा सूत्र खोज लाओ. बड़ी देर तक मंथन चला और कुछ हल नहीं निकला. फिर सबने राजा को सुझाया- हमने सुना है एक सूफी फकीर गांव के बाहर ठहरा है वह प्रज्ञा को उपलब्ध, संबोधी को उपलब्ध व्यक्ति है, क्यों न हम उसी के पास चलें?
लोगों ने जाकर उस सूफी फकीर को पूरी बात बताई. उसने एक अंगूठी पहन रखी थी अपनी उंगली में वह निकालकर सम्राट को दे दी और कहा– इसे पहन लो. इस पत्थर के नीचे एक छोटा सा कागज रखा है, उसमें सूत्र लिखा है, वह मेरे गुरु ने मुझे दिया था, मुझे तो जरूरत न पड़ी इसलिए मैंने अभी तक खोलकर देखा भी नहीं.
उन्होंने एक शर्त रखी थी कि जब विपरित हालात हों और कुछ भी उपाय न रह जाये, तब ही इसे खोलकर पढ़ना.
सम्राट ने अंगूठी पहन ली, वर्षों बीत गये. कई बार जिज्ञासा भी हुई. फिर सोचा कि कहीं खराब न हो जाए, फिर काफी वर्षों बाद एक युद्ध हुआ जिसमें सम्राट हार गया, और दुश्मन जीत गया. उसके राज्य को हड़प लिया. वह सम्राट एक घोड़े पर सवार होकर भागा अपनी जान बचाने के लिए. राज्य तो गया संघी, साथी, दोस्त, परिवार सब छूट गए., दो-चार सैनिक और रक्षक उसके साथ थे वे भी धीरे-धीरे हट गये क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं था तो रक्षा करने का भी कोई सवाल न था.
दुश्मन उस सम्राट का पीछा कर रहा था, तो सम्राट एक पहाड़ी घाटी से होकर भागा जा रहा था. उसके पीछे घोड़ों की आवाजें आ रही थीं. टापे सुनाई दे रही थी. प्राण संकट में थे, अचानक उसने पाया कि रास्ता समाप्त हो गया, आगे तो भयंकर गड्ढा है वह लौट भी नहीं सकता था, एक पल के लिए सम्राट स्तब्ध खड़ा रह गया कि क्या करें?
फिर अचानक याद आई, खोली अंगूठी, पत्थर हटाया, निकाला कागज, उसमें एक छोटा सा वचन लिखा था- 'यह वक्त भी गुजर जाएगा'.
सूत्र पढ़ते ही उस सम्राट के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई. उसके चेहरे पर एक बात का खयाल आया. सब तो बीत गया, में सम्राट न रहा, मेरा साम्राज्य गया, सुख बीत गया, जब सुख बीत जाता है तो दुख भी स्थिर नहीं हो सकता. शायद सूत्र ठीक कहता है. अब करने को कुछ भी नहीं हैं लेकिन सूत्र ने उसके भीतर कोई सोया तार छेड़ दिया. कोई साज छेड़ दिया. यह भी बीत जायेगा. ऐसा बोध होते ही जैसे सपना टूट गया. अब वह व्यग्र नहीं, बैचेन नहीं, घबराया हुआ नहीं था. वह बैठ गया.
संयोग की बात थी, थोड़ी देर तक तो घोड़े की टाप सुनायी देती रही. फिर टाप बंद हो गई. शायद सैनिक किसी दूसरे रास्ते पर मुड़ गए. घना जंगल और बिहड़ पहाड उन्हें पता नहीं चला कि सम्राट किस तरफ गया है. धीरे-धीरे घोड़ों की टाप दूर हो गयी, अंगूठी उसने वापस पहन ली.
कुछ दिनों बार दोबारा उसने अपने मित्रों को वापस इकठ्ठा कर लिया, फिर उसने वापस अपने दुश्मन पर हमला किया, पुनः जीत हासिल की, फिर अपने सिंहासन पर बैठ गया. जब सम्राट अपने सिंहासन पर बैठा तो बड़ा आनंदित हो रहा था.
तभी उसे फिर पुनः उस अंगूठी की याद आई, उसने अंगूठी खोली, कागज को पढ़ा, फिर मुस्कुराया, दोबारा सारा आनन्द विजयी का उल्लास, विजय का दंभ सब विदा हो गया. उसके वजीरों ने पूछा- आप बड़े प्रसन्न थे अब एक दम शांत हो गये क्या हुआ ?
सम्राट ने कहा- जब सभी बीत जायेगा तो इस संसार में न तो दुखी होने को कुछ है और न ही सुखी होने को कुछ है. तो जो चीज तुम्हें लगती है कि बीत जायेगी उसे याद रखना, अगर यह सूत्र पकड़ में आ जाये, तो और क्या चाहिए ? तुम्हारी पकड़ ढ़ीली होने लगेगी. तुम धीरे-धीरे अपने को उन सब चीजों से दूर पाने लगोगे जो चीजें बीत जायेगी. क्या अकड़ना, कैसा गर्व, किस बात के लिए इठलाना, सब बीत जायेगा. यह जवानी बीत जायेगी.
इसलिए जीवन में हालात जैसे भी हों साहस के साथ उसका सामना कीजिए. जो नियती है उसे स्वीकार कीजिए, बेहतर की ओर लगातार कोशिश कीजिए. कोई भी चीज आपको तब तक नहीं हरा सकती जबतक आप खुद हार को स्वीकार न कर लें.
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं-
सच है विपत्ति जब आती है
कायर को ही दहलाती है
सूरमा नहीं विचलित होते
क्षण एक नहीं धीरज खोते
विघ्नों को गले लगाते हैं
कांटों में राह बनाते हैं...

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