इस धरती पर मौजूद बाकी जीवों के बारे में तो हम नहीं जानते लेकिन हम इंसानों के जीवन में बाहर से जितना तूफान दिखता है अंदर उससे भी ज्यादा हलचल मची हुई है. मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक इंसान चाहे बोले न या मौन रहे लेकिन उसके मन में विचारों की आंधी है. शोध के अनुसार, एक औसत व्यक्ति के मन में प्रतिदिन लगभग 60,000 विचार आते हैं। इनमें से अधिकांश नकारात्मक होते हैं. जो इनसे अंदर ही अंदर लड़कर इनपर हावी हो जाता है उसका दिन सकारात्मक बीत जाता है और जिनपर ये विचार हावी हो जाते हैं उनका दिन नकारात्मक बीतता है.
बेशक हम इंसान सामाजिक प्राणी हैं लेकिन हमारा बेस एकल है, यानी हमारे अधिकांश अनुभव एकांत के होते हैं. भले ही हम भीड़ में रहते हैं लेकिन जिंदगी के अधिकांश हालातों को हम अकेले ही फेस करते हैं. कई बार हम बहुत बेचैनी महसूस करते हैं, कई बार अपने जीवन में चल रही चीजों को लेकर और कई बार अपने आसपास चल रहीं चीजों को लेकर... कभी निराशा, कभी उलझन महसूस होती है तो कभी चीजें सुलझती हुई भी लगती हैं. हमारी जिंदगी में चल रहीं ज्यादातर चीजें हमारी मनोदशा को प्रभावित करती हैं.
ओशो कहते हैं- 'हम जीते हैं भीतर से, हमारे जीने के सारे गहरे आधार भीतर हैं. इसलिए जो भीतर है, वही बाहर फैल जाता है. भीतर सदा ही बाहर को जीत लैता है. ओवरपावर कर लेता है. इसलिए जब आपको बाहर नर्क दिखाई पड़े तो बहुत खोज करना. पाएंगे कि भीतर नर्क है. बाहर सिर्फ रिफ्लेक्शन है, बाहर सिर्फ प्रतिफलन है. और जब बाहर स्वर्ग दिखाई पड़े, तब भी भीतर देखना. तो पाएंगे कि भीतर स्वर्ग है. बाहर सिर्फ प्रतिफलन है. '
यानी, हम अपने विचारों की दिशा बदलकर अपने हालातों को काफी हद तक सकारात्मक बना सकते हैं. हालातों से लड़कर या तो हालात को बदला जा सकता है या उसे स्वीकार करके अपनी मनोदशा को. दोनों ही स्थितियों में आप उलझन वाले हालात से खुद को बेहतर महसूस करेंगे. क्योंकि हालातों को जीतने से पहले आपको अपने मन को जीतना होगा.
मतलब जीवन है तो समस्याएं लगी ही रहेंगी, जब तक जीवन है तब तक लगी रहेंगी. ऐसे में हमें खुद पर काम करना होगा ताकि शांति के साथ खुद को मौका दे सकें जीवन को आनंद के साथ बिताने का.
पश्चिमी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैसलो कहता है- 'व्यक्ति के जीवन में स्वर्ग का क्षण वही है, जो उसके व्यक्तित्व के शिखर का क्षण है. जिस क्षण कोई व्यक्ति जो हो सकता है, उसके होने के शिखर पर पहुंच जाता है, उसके आगे कोई उपाय नहीं बचता. जिसके आगे कोई मार्ग नहीं बचता. जिसके आगे कोई ऊंचाई नहीं बचती. जब भी कोई व्यक्ति अपने भीतर के पीक को छू लेता है तभी समाधि, यानी एक्सटैसी अनुभव करता है.'
आखिरकार जीवन की बात वहीं आकर टिक जाती है जहां कबीर कहते हैं- 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत'

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