एक पर्शियन कहावत है- जूते न होना मुझे सता रहा था लेकिन उस वक्त तक ही जब मैं बिना पैर के व्यक्ति से मिला.
भगवदगीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- धर्मक्षेत्रे, कर्मक्षेत्रे, समावेत: युयुत्सव:
अर्थात, यह संसार महाभारत के कुरुक्षेत्र की भांति कर्म के युद्ध का मैदान है. यहां कर्मयुद्ध तो करना ही पड़ेगा और कोई चारा नहीं है. यह दुनिया ऐसी ही है, यहां कमजोरी अभिशाप है. प्रकृति भी कमजोर जीवों को जिलाए रखने के पक्ष में नहीं होती. इसलिए कर्म निरन्तर जरूरी है... ताकि आत्मबल, शरीर बल और समाज बल बनाए रखा जा सके.

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