Sunday, 20 October 2024

असली जंग तो मन के अंदर चल रही...

इस धरती पर मौजूद बाकी जीवों के बारे में तो हम नहीं जानते लेकिन हम इंसानों के जीवन में बाहर से जितना तूफान दिखता है अंदर उससे भी ज्यादा हलचल मची हुई है. मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक इंसान चाहे बोले न या मौन रहे लेकिन उसके मन में विचारों की आंधी है. शोध के अनुसार, एक औसत व्यक्ति के मन में प्रतिदिन लगभग 60,000 विचार आते हैं। इनमें से अधिकांश नकारात्मक होते हैं. जो इनसे अंदर ही अंदर लड़कर इनपर हावी हो जाता है उसका दिन सकारात्मक बीत जाता है और जिनपर ये विचार हावी हो जाते हैं उनका दिन नकारात्मक बीतता है. 

बेशक हम इंसान सामाजिक प्राणी हैं लेकिन हमारा बेस एकल है, यानी हमारे अधिकांश अनुभव एकांत के होते हैं. भले ही हम भीड़ में रहते हैं लेकिन जिंदगी के अधिकांश हालातों को हम अकेले ही फेस करते हैं. कई बार हम बहुत बेचैनी महसूस करते हैं, कई बार अपने जीवन में चल रही चीजों को लेकर और कई बार अपने आसपास चल रहीं चीजों को लेकर... कभी निराशा, कभी उलझन महसूस होती है तो कभी चीजें सुलझती हुई भी लगती हैं. हमारी जिंदगी में चल रहीं ज्यादातर चीजें हमारी मनोदशा को प्रभावित करती हैं.

ओशो कहते हैं- 'हम जीते हैं भीतर से, हमारे जीने के सारे गहरे आधार भीतर हैं. इसलिए जो भीतर है, वही बाहर फैल जाता है. भीतर सदा ही बाहर को जीत लैता है. ओवरपावर कर लेता है. इसलिए जब आपको बाहर नर्क दिखाई पड़े तो बहुत खोज करना. पाएंगे कि भीतर नर्क है. बाहर सिर्फ रिफ्लेक्शन है, बाहर सिर्फ प्रतिफलन है. और जब बाहर स्वर्ग दिखाई पड़े, तब भी भीतर देखना. तो पाएंगे कि भीतर स्वर्ग है. बाहर सिर्फ प्रतिफलन है. '

यानी, हम अपने विचारों की दिशा बदलकर अपने हालातों को काफी हद तक सकारात्मक बना सकते हैं. हालातों से लड़कर या तो हालात को बदला जा सकता है या उसे स्वीकार करके अपनी मनोदशा को. दोनों ही स्थितियों में आप उलझन वाले हालात से खुद को बेहतर महसूस करेंगे. क्योंकि हालातों को जीतने से पहले आपको अपने मन को जीतना होगा. 

मतलब जीवन है तो समस्याएं लगी ही रहेंगी, जब तक जीवन है तब तक लगी रहेंगी. ऐसे में हमें खुद पर काम करना होगा ताकि शांति के साथ खुद को मौका दे सकें जीवन को आनंद के साथ बिताने का.

पश्चिमी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैसलो कहता है- 'व्यक्ति के जीवन में स्वर्ग का क्षण वही है, जो उसके व्यक्तित्व के शिखर का क्षण है. जिस क्षण कोई व्यक्ति जो हो सकता है, उसके होने के शिखर पर पहुंच जाता है, उसके आगे कोई उपाय नहीं बचता. जिसके आगे कोई मार्ग नहीं बचता. जिसके आगे कोई ऊंचाई नहीं बचती. जब भी कोई व्यक्ति अपने भीतर के पीक को छू लेता है तभी समाधि, यानी एक्सटैसी अनुभव करता है.'

आखिरकार जीवन की बात वहीं आकर टिक जाती है जहां कबीर कहते हैं- 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत'

 'किताबों ने कहा- हमें पढ़ो ताकि तुम्हारे भीतर चीजों को बदलने की बेचैनी पैदा हो सके...' 

Sunday, 13 October 2024

रावण कम है, जलाने वाले ज्यादा लेकिन कलयुग अखबारों के हर पन्ने पर हावी है...कुछ तो लोचा है समाज के गणित में!


फ़हमी बदायूनी लिखते हैं-

ये जो बाहर खुदा से डर रहे हैं,

बहुत कुछ दिल के अंदर कर रहे हैं,

यहां पर कोई दरियादिल नहीं है,

सब अपना-अपना पानी भर रहे हैं...

बात किसी धर्म की नहीं है समाज की है, इंसानियत की है, इंसान की है.

गजब का नजारा है... सुबह-सुबह अखबार देखा तो रावण दहन करने वालों का रेला हर जगह मेन पेज पर दिखा. हर शहर-हर गली में तथाकथित प्रमुख लोग खासकर नेता जी लोगों ने रावण दहन की रस्म जमकर निभाई और खूब तीर छोड़े. इतनी तस्वीरें-इतनी तस्वीरें एक बार तो देखकर लगा कि रावण खत्म हो गया होगा, उसकी विचारधारा धरती से मिट गई होगी. समाज एकदम सेफ टाइप हो चुका होगा. सही का विजयदशमी टाइप. ऐसा लगा कि समाज से रावणों का अंत हो चुका होगा और रामराज्य वाला सीन आगे के पन्नों पर दिखेगा.

लेकिन...

जैसे ही अंदर के पन्नों पर पहुंचा राम तो नहीं रावणों की करतूतों की खबरें ही हर पन्ने पर छाई दिखी. कही हत्या, कहीं लूट, कहीं बलात्कार, कहीं ठगी... इसके अलावा तो कुछ था ही नहीं. बच्चा आया उसे स्कूल के किसी फंक्शन के लिए 6 गुड न्यूज चाहिए थे बेचारे ने सारे अखबार पलट डाले, वेबसाइट्स पलट डाले लेकिन 6 गुड न्यूज नहीं निकाल सका. आखिर ऐसा क्यों है कि हमारा जो समाज रावणों को दहन करने की रेस की फोटो खिंचाते दिख रहा है वहां राम की इतनी कमी और रावणों की इतनी अधिकता है? या तो समाज के गणित में लोचा है या इंसान और इंसानियत में कुछ केमिकल लोचा?

हर जगह तो श्रद्धा दिख रही है फिर इतनी वहशत क्यों है. क्या हम केवल ऊपर-ऊपर धार्मिक होने के दिखावे करने में जुटे हुए हैं? मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भक्तों का रेला है, हर जगह लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं, एंट्री तक कर पाना मुश्किल साबित हो रहा है. बाबाओं की कथाओं को सुनने के लिए बसें-रेल और ट्रक-ट्रैक्टरों में लोट ठूंस-ठूंसकर जा रहे हैं, हर कोई भक्ति के रंग में रंगा है तो ये सब समाज में क्यों नहीं दिख रहा है. अखबार कुकर्मों से क्यों भरे हुए हैं? क्यों नहीं अखबारों को पढ़कर रामराज्य वाली फीलिंग आ रही है. क्या ये समाज के रूप में हमारा फेल्योर नहीं है?

बस इतना ही कह सकते हैं...

मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भक्तों का रेला है

रावण जलाने वालों में ठेलमठेला है...

लेकिन अखबार के हर पन्ने रावणों के कुकर्मों से भरे पड़े हैं...

आखिर ये कलयुग नहीं तो और कौन सा युग है?

कृष्ण से बड़ा कोई पूर्ण पुरुष नहीं. बचपन जिया तो ऐसा कि हरेक मां ने अपने बेटे को कन्हैया कहना शुरू कर दिया, जवानी जी तो ऐसी कि प्रेम की मिसा...