ये जो बाहर खुदा से डर रहे हैं,
बहुत कुछ दिल के अंदर कर रहे हैं,
यहां पर कोई दरियादिल नहीं है,
सब अपना-अपना पानी भर रहे हैं...
बात किसी धर्म की नहीं है समाज की है, इंसानियत की है, इंसान की है.
गजब का नजारा है... सुबह-सुबह अखबार देखा तो रावण दहन करने वालों का रेला हर जगह मेन पेज पर दिखा. हर शहर-हर गली में तथाकथित प्रमुख लोग खासकर नेता जी लोगों ने रावण दहन की रस्म जमकर निभाई और खूब तीर छोड़े. इतनी तस्वीरें-इतनी तस्वीरें एक बार तो देखकर लगा कि रावण खत्म हो गया होगा, उसकी विचारधारा धरती से मिट गई होगी. समाज एकदम सेफ टाइप हो चुका होगा. सही का विजयदशमी टाइप. ऐसा लगा कि समाज से रावणों का अंत हो चुका होगा और रामराज्य वाला सीन आगे के पन्नों पर दिखेगा.
लेकिन...
जैसे ही अंदर के पन्नों पर पहुंचा राम तो नहीं रावणों की करतूतों की खबरें ही हर पन्ने पर छाई दिखी. कही हत्या, कहीं लूट, कहीं बलात्कार, कहीं ठगी... इसके अलावा तो कुछ था ही नहीं. बच्चा आया उसे स्कूल के किसी फंक्शन के लिए 6 गुड न्यूज चाहिए थे बेचारे ने सारे अखबार पलट डाले, वेबसाइट्स पलट डाले लेकिन 6 गुड न्यूज नहीं निकाल सका. आखिर ऐसा क्यों है कि हमारा जो समाज रावणों को दहन करने की रेस की फोटो खिंचाते दिख रहा है वहां राम की इतनी कमी और रावणों की इतनी अधिकता है? या तो समाज के गणित में लोचा है या इंसान और इंसानियत में कुछ केमिकल लोचा?
हर जगह तो श्रद्धा दिख रही है फिर इतनी वहशत क्यों है. क्या हम केवल ऊपर-ऊपर धार्मिक होने के दिखावे करने में जुटे हुए हैं? मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भक्तों का रेला है, हर जगह लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं, एंट्री तक कर पाना मुश्किल साबित हो रहा है. बाबाओं की कथाओं को सुनने के लिए बसें-रेल और ट्रक-ट्रैक्टरों में लोट ठूंस-ठूंसकर जा रहे हैं, हर कोई भक्ति के रंग में रंगा है तो ये सब समाज में क्यों नहीं दिख रहा है. अखबार कुकर्मों से क्यों भरे हुए हैं? क्यों नहीं अखबारों को पढ़कर रामराज्य वाली फीलिंग आ रही है. क्या ये समाज के रूप में हमारा फेल्योर नहीं है?
बस इतना ही कह सकते हैं...
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भक्तों का रेला है
रावण जलाने वालों में ठेलमठेला है...
लेकिन अखबार के हर पन्ने रावणों के कुकर्मों से भरे पड़े हैं...
आखिर ये कलयुग नहीं तो और कौन सा युग है?

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