इंसान का जीवन परिवर्तनों का एक वो सिलसिला है जो उसे आने वाली नियती के लिए तैयार करता है, उसे हर परिस्थिति में एक जैसा बने रहने के लिए प्रेरित करता है और फिर मंजिल पर पहुंचकर ठोस टिके रहने के काबिल बनाता है.
भगवदगीता में लिखा है- परिवर्तन प्रकृति का नियम है. इस दुनिया में सबकुछ नश्वर है, केवल परिवर्तन ही स्थायी है. यह जानने के बावजूद कि हमारी भावनाएं, शरीर, धारणाएं और बाकी सब कुछ परिवर्तन की स्थिति में हैं, फिर भी हम इंसान किसी भी बदलाव को स्वीकार करने में अनिच्छुक हैं.
दरअसल, हम इंसान किसी भी बदलाव को लेकर सहज नहीं हैं और इसका विरोध करते हैं. हमारा समूचा जीवन परिवर्तनों से जूझते हुए बितता है. भगवदगीता इस बात पर जोर देती है कि लोगों को सफलता प्राप्त करने के लिए परिस्थितियों के अनुकूल ढलने की आवश्यकता है. उन्हें नए अनुभव प्राप्त करने के लिए नवप्रवर्तन करना चाहिए, अन्वेषण करना चाहिए, नए विचारों और समाधानों के साथ आना चाहिए, जोखिम उठाना चाहिए और परिवर्तनों को स्वीकार करना चाहिए. यही आगे बढ़ने का और सफलता हासिल करने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है.
भगवदगीता का अध्याय 18, श्लोक 46 कहता है-
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।
यानी,
हर किसी के जीवन में एक अनोखा रास्ता और उद्देश्य होता है जिसका उन्हें पालन करना चाहिए. अपने कर्तव्यों का पालन लगन और निष्ठा से करना महत्वपूर्ण है.
हम अपने कार्यों पर ध्यान केंद्रित करके और दूसरों से अपनी तुलना न करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं. इसके अलावा, यह हमें दिखाता है कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत, समर्पण और भक्ति आवश्यक है. अपने धर्म में आस्था और जीवन में अनुशासन कोई पिछड़ेपन की निशानी नहीं है बल्कि असल धर्म वही है जो आपको सही रास्ता दिखाए और कर्मक्षेत्र की ओर ले जाए.

No comments:
Post a Comment