कृष्ण से बड़ा कोई पूर्ण पुरुष नहीं.
बचपन जिया तो ऐसा कि हरेक मां ने अपने बेटे को कन्हैया कहना शुरू कर दिया,
जवानी जी तो ऐसी कि प्रेम की मिसाल बन गए,
युद्ध रचाया तो ऐसा कि 5 निर्वासित लड़कों को विजेता बना दिया, और ज्ञान दिया तो गीता जैसा...
हमारी खुशी की कुंजी हमारे पास ही है. हमारी समस्याओं का समाधान हमारे पास ही है. इसके लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं है बल्कि खुद से खुद की पहचान कराने की जरूरत है. अपने अंदर और बाहर के तार को जोड़ने की जरूरत है. आइए Happy Science के जरिए मिलकर रास्तों को तय करते हैं, मुश्किलों को आसान बनाते हैं.
बड़े विद्वान कह गए हैं- 'वाणी चांदी है, मौन स्वर्ण है'.
जीवन में इसका संतुलन न केवल आपके मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. तभी बुद्ध, विवेकानंद, गांधी से लेकर ओशो तक ने मौन के महत्व पर जोर दिया है.
थॉमस हूड की एक कविता है जो जीवन में और संसार में मौन के महत्व को बताती है-
''वहां एक सन्नाटा है जहां कोई आवाज नहीं हो सकती,
ठंडी कब्र में- गहरे, गहरे समुद्र के नीचे,
या विस्तृत रेगिस्तान में जहां कोई जीवन नहीं पाया जाता,
जो मूक रहा है, और अभी भी गहरी नींद में सो रहा है;
कोई आवाज़ बंद नहीं है- कोई जीवन चुपचाप नहीं चलता,
लेकिन बादल और धुंधली छायाएं स्वतंत्र रूप से घूमती हैं,
जो कभी नहीं बोलीं, निष्क्रिय जमीन पर,
लेकिन हरे खंडहरों में, पुराने महलों की उजाड़ दीवारों में
जहां आदमी रहा है,
हालांकि भूरे लोमड़ी या जंगली लकड़बग्घा पुकारते हैं,
और उल्लू, जो लगातार बीच-बीच में उड़ते रहते हैं,
प्रतिध्वनि पर चीखते हैं, और धीमी हवाएं विलाप करती हैं,
वहां सच्चा मौन है, आत्म-चेतन और अकेला ।।।''
हम सब एक बोलते हुए समाज में रहते हैं, एक शोर भरे समाज में... जहां हमारे पहले शब्द बोलने का भी जश्न मनाया जाता है. आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि एक इंसान दिन भर में औसतन 20 हजार शब्द बोलता है. बोलने से भी अलग हमारे मन में विचारों का शोर ज्यादा तेज रहता है. एक स्टडी के अनुसार एक इंसान के मन में रोज 6 हजार से अधिक विचार आते हैं.
हमारे शब्द और हमारा बोलना बहुत मायने रखता है. लेकिन एक और पहलू है जीवन का. और वो है मौन... इन सबका मर्म इस सवाल के जवाब में छिपा है कि क्या मौन केवल वह स्थिति है जहां शब्दों की शून्यता होती है? आखिर क्या है मौन में कि उसपर सदियों से इतनी चर्चा होती आई है?
मौन स्वर्णिम है लेकिन मुश्किल भी है. आप किसी ऐसी जगह एक घंटे बैठकर देखें जहां कोई एक शब्द भी नहीं बोलता... आपको मौन शोर मचाता हुआ, आपको बेचैन करता हुआ दिखेगा. मौन को अपनाना इतना आसान नहीं है. दिल्ली के लोटस टेंपल के अंदर जहां कुछ नहीं है मौन के सिवा, कुछ ही मिनटों में लोग भागने लगते हैं उठकर. क्योंकि मौन का सामना करना उतना आसान नहीं है.
अमेरिका के मिनिसोटा में एनीकोटिक चैंबर नाम से एक कमरा बनाया गया है. यह एक लेबोरेटरी है. गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में यह दुनिया की सबसे शांत जगह है. एनीकोटिक रूम का मतलब है कि यहां पर कोई प्रतिध्वनि नहीं होती है यानी आवाज यहां गूंजती नहीं है. क्योंकि यह कमरा 99.99 प्रतिशत ध्वनि को अवशोषित कर लेता है. अगर शांति को एक पैरामीटर में मापा जाए तो सोते समय हमारे बेडरूम में 30 डेसीबल शांति रहती है, जबकि इस लेबोरेटरी में माइनस 9 डेसीबल की शांति रहती है.
यहां इतनी शांति है कि कई लोगों ने कोशिश की यहां समय बिताने की लेकिन 45 मिनट से ज्यादा यहां कोई टिक नहीं पाया. इस कमरे में जब कोई व्यक्ति सांस भी लेता है, उसके दिल की धड़कन, धमनियों में बहता खून, फेफड़े की आवाज सब कुछ सुनाई देती है और यह सब सुनना एक नॉर्मल इंसान को पागल बना सकता है. बहुत बहादुर लोगों ने वहां पर रहने की कोशिश की लेकिन 45 मिनट से ज्यादा कोई इंसान वहां पर टिक नहीं पाया. इतना शोर होता है मौन में.
"मौन मुनि मन राख्यो..." का अर्थ है कि मौन रहने से मन शांत होता है और यह एक साधु के लिए, या किसी भी व्यक्ति के लिए जो आंतरिक शांति की तलाश में है, एक महत्वपूर्ण अभ्यास है. लेकिन मौन का अर्थ केवल बाहरी चुप्पी नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक विकास भी है. मौन को अध्यात्म में एक महत्वपूर्ण अभ्यास माना जाता है, जो व्यक्ति को अपने भीतर की आवाज को सुनने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है. इससे जहां मानसिक तनाव कम होता है, वहीं क्रोध और अहंकार कम होते हैं, और व्यक्ति में धैर्य और सहनशीलता बढ़ती है. श्रीमद्भगवद्गीता में मौन को योग और तप का एक रूप बताया गया है.
मौन रहने के कई वैज्ञानिक लाभ भी होते हैं- जैसे कि तनाव कम होना, एकाग्रता में सुधार, और रचनात्मकता में वृद्धि, साथ ही यह कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करने, नींद की गुणवत्ता में सुधार करने और बेहतर रक्तचाप नियंत्रण में मदद करता है.
मौन का एक और फायदा है. ओशो कहते हैं- आपके जीवन के अधिकांश क्लेश आपके बोलने से होता है. आपसे की जाने वाली अधिकांश बातों पर आप प्रतिक्रिया देते हैं जबकि उनमें से केवल 10 प्रतिशत ही ऐसी होती हैं जिनमें आपकी प्रतिक्रिया की जरूरत होती है. आप प्रयोग करके देखें जैसे-जैसे आप मौन को अपनाते जाएंगे जीवन के क्लेश कम होते चले जाएंगे. ओशो कहते हैं- मौन करुणा को जगाता है. जब तुम मौन रहना सीख जाओगे, तब सारे प्रश्न गिर जायेंगे. जब अकेले हो तो पूरी तरह से मौन में बैठो, और स्वयं को देखो. अपनी श्वास को देखो, अपने विचारों को देखो, अपनी स्मृतियों को देखो. अपने को संपूर्णता में देखो, बिना किसी दखल के; बस देखना. ओशो के मुताबिक, प्रेम और ध्यान को साथ-साथ सीखना चाहिए.
मौन व्रत की प्राचीन भारतीय परंपरा भी रही है जो आत्म-नियंत्रण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देती है.
ऋषि-मुनि और साधु-संत अपने जीवन में मौन के महत्व को समझते थे. इससे व्यक्ति को अपने विचारों और वाणी पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है, जिससे मानसिक शांति और आत्म-संयम प्राप्त होता है. एकाग्रता को बढ़ाने में भी यह मदद करता है.
बुद्ध, विवेकानंद और गांधी ये तीनों मौन को जीवन का एक जरूरी हिस्सा मानते थे. मौन और ध्यान के जरिए ज्ञान और संयम पर इन्होंने लगातार काम किया. बुद्ध मौन को ज्ञान और आत्म-जागरूकता की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग मानते थे, जो मन को शांत करके आंतरिक सत्य को प्रकट करता है. वहीं स्वामी विवेकानंद मौन को क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा मानते थे. महात्मा गांधी तो हर सोमवार मौन व्रत रखते थे, जिसमें वे किसी से बात नहीं करते थे, और जरूरत पड़ने पर वे लिख लेते थे, लेकिन बोलते बिल्कुल नहीं थे. उनका मानना था कि मौन व्रत आपकी वाणी को संयमित और आत्मा को शुद्ध करता है. मौन व्रत के माध्यम से वे बाहरी दुनियावी चीजों को मन से निकालना चाहते थे और शांति प्राप्त करना चाहते थे.
तमाम जीवों में मनुष्य विशेष रूप से मन प्रधान जीव है. वह जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है. हम इंसान बाकी जीवों से अलग हैं सिर्फ अपने मस्तिष्क के कारण, अपने मन के कारण और अपनी सोचने-समझने की क्षमता के कारण... क्योंकि हमारे विचार ही हमें डिफाइन करते हैं, हमारी पर्सनैलिटी को हमारे आसपास तैर रहे विचार ही गढ़ते हैं.
इसीलिए सिगमंड फ्रायड कहते थे- मनुष्य तब तक शक्तिशाली होता है जब तक वह किसी मज़बूत विचार का प्रतिनिधित्व करता है. इतिहास गवाह है कि दुनिया का हर सशक्त इंसान अपनी सही ताकत तभी पहचानता है जब वो अपने विचारों को मजबूत करता है. राम अपनी मर्यादा, करुणा, दया, और धर्मपरायणता, तो बुद्ध त्याग के विचार से, गांधी सत्य और अहिंसा के विचार से तो विवेकानंद धर्म के ज्ञान और तप से खुद को दुनिया में सबसे अलग खड़ा कर पाए...
अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि हमारे भी जीवन पर उन विचारों का सीधा असर दिखता है जिनका हमें रोज समना करना होता है. मसलन हम जिनके बीच रहते हैं उनके विचार क्या हैं, हम क्या खाते हैं, हम क्या देखते-सुनते और बोलते हैं, हम क्या पढ़ते हैं? ये सारी चीजें हमें गढ़ रही होती हैं. विचार के रूप में और व्यक्तित्व के रूप में भी.
इसीलिए अरस्तु ने इंसान को सामाजिक जीव बोला है तो सिगमंड फ्रायड ने मानसिक जीव. भगवद्गीता में भी कहा गया है कि इंद्रियों के अधीन होने से मनुष्य के जीवन में विकार और परेशानियां आती हैं और जो अपने मन को सभी विकारों से मुक्त कराते चला जाता है वह निर्भय होते चला जाता है.
यही मन का विज्ञान है. हमारे मन की ताकत और हमारे विचार ही हमें बुलंदियों की ओर लेकर जाते हैं. इसलिए जैसे हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए खाना और व्यायाम पर फोकस करते हैं वैसे ही हमें अपने मन को भी मजबूत करने के लिए लगातार ज्ञान और अच्छे विचारों की खुराक देने की जरूरत होती है.
कई बार अपनी मनचाही चीजें नहीं मिलने पर हम दुखी हो जाते हैं. हमें अपना जीवन विफल होते लगने लगता है. हम सोचते हैं कि शायद ईश्वर के हम प्रिय नहीं हैं. लेकिन जो लोग प्रकृति के काम करने के तरीके को समझते हैं वे जानते हैं कि समय की अपनी योजना होती है. वो आपके लिए आपकी मनचाही चीजें दे न दे लेकिन वो जरूर देती है जिसके लिए आपको धरती पर लाया गया है. जिसके लिए आपका बृहद रोल कुदरत ने तय कर रखा है.
भगवान राम की अगले दिन ताजपोशी होनी थी, अयोध्या में भव्य तैयारियां हो रखी थीं. लेकिन अचानक बाधा आ गई, राजा दशरथ को रानी कैकेई की शर्तें माननी पड़ीं और राम को सिंहासन की बजाय जंगल की ओर प्रस्थान करना पड़ा. अगले 14 साल राजयोग की जगह जंगल में भटकना, तमाम जंगली जानवरों और असुरों का संकट झेलना लिखा था उनकी किस्मत में, और आखिरकार महाबली लंकाधिपति रावण से भिड़ना पड़ा.
कुदरत की ओर से राम के सामने चुनौतियां आती गईं और उन्होंने अपने साहस, कूटनीति और पराक्रम से हर चुनौती को पार किया. हमेशा सत्य और अच्छाई पर टिके रहे. उन्होंने लंकापति रावण का खात्मा कर कई राज्यों को उसके अत्याचार से बचाया, सीता के मान की रक्षा की. तभी दुनिया ने उन्हें भगवान का दर्जा दिया. सोचिए अगर वे तब अयोध्या का राजा बन गए होते तो बाकी आम राजाओं की तरह ही रह जाते लेकिन उनकी चुनौतियों ने उन्हें ऐतिहासिक स्थान दिलाया. जिनकी आज हजारों साल बाद भी कोई दूसरी मिसाल नहीं है.
यही हालात, स्वामी विवेकानंद के जीवन में भी आया था. साल 1884 में जब वे नरेंद्र नाथ हुआ करते थे, अभी-अभी स्नातक की परीक्षा पास की थी. पिता के अचानक निधन से परिवार का जिम्मा उनके ऊपर गया. विवेकानंद नौकरी के लिए कोलकाता के दफ्तरों में दिनभर चक्कर लगाया करते थे. हर तरफ से निराशा हाथ लग रही थी. कभी-कभी खाली पेट सिर्फ पानी पीकर पार्क में बैठकर सोचा करते कि क्या कुदरत ने उन्हें इस हाल के लिए बनाया है. तब शायद वे कुदरत के प्लान से अनभिज्ञ थे.
वक्त बदला, कुदरत की सुई घूमी. विवेकानंद उस ओर बढ़ चले जिसके लिए उन्हें इस धरती पर लाया गया था. वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए. अब वे धर्म पथ पर बढ़ चले. उन्होंने पूरे भारत का दौरा किया और धार्मिक प्रयासों से सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की. कश्मीर से कन्याकुमारी तक, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से लेकर साउथ में रामेश्वर तक उन्होंने सनातन धर्म की जड़ें मजबूत कीं.
फिर वे अमेरिका की ओर बढ़ चले. शिकागो समेत पूरा अमेरिका, रोम, ब्रिटेन, जर्मनी घूम-घूमकर उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार किया. वहां वेदांत की संस्थाएं स्थापित की. असंख्य अमेरिकी और ब्रिटिश लोग उनके भक्त बनकर सनातन धर्म के लिए काम करने लगे. कोलकाता में वेलूर मठ स्थापित करने में विदेशियों ने जमकर मेहनत की. कई विदेशी भक्त अमेरिका-यूरोप में काम करने लगे तो कई अपना घर-बार छोड़कर सनातन धर्म की सेवा के लिए इंडिया में आ बसे.
दुनियाभर में स्वामी विवेकानंद ने धर्म की जड़ें जमा दीं वो भी उस काल में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था. अंग्रेज मूल के लोग इंडियंस को बराबरी का समझते तक नहीं थे. सोचिए अगर विवेकानंद को संघर्ष के दिनों में कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल गई होती तो? वे आम गृहस्थ की तरह सांसारिक झंझटों में उलझकर ही रह जाते. उनका विराट स्वरूप दुनिया देख ही नहीं पाती.
इसीलिए हमारे जीवन में भी जब चीजें कुछ ठीकठाक नहीं चल रही हों तो हमें समझने की जरूरत है कि कुदरत का कुछ और ही प्लान है हमारे लिए. जिसे शायद अभी हम देख नहीं पा रहे हों लेकिन कुछ बड़ा हमारा इंतजार कर रहा है. इसी सोच के साथ अगर आप विपरित हालातों का सामना करें तो आपके अंदर एक अलग तरह की एनर्जी दिखेगी और आप समस्याओं के दौर को पार कर जीवन के नए फेज में कब आ जाएंगे आपको पता भी नहीं चलेगा.
साहिर लुधियानवी लिखते हैं-
संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
इक धुंध से आना है, इक धुंध में जाना है
ये राह कहां से है, ये राह कहां तक है
ये राज़ कोई राही, समझा है न जाना है
इक पल की पलक पर है, ठहरी हुई ये दुनिया
इक पल के झपकने तक, हर खेल सुहाना है
क्या जाने कोई किस पर, किस मोड़ पर क्या बीते
इस राह में ऐ राही, हर मोड़ बहाना है
हम लोग खिलौना हैं, इक ऐसे खिलाड़ी का
जिस को अभी सदियों तक, ये खेल रचाना है...
इस दुनिया में कई तिलिस्म हैं जिन्हें अबतक कोई सुलझा नहीं सका है और लगता है आगे भी ये ऐसे ही बने रहेंगे. आप सोचकर देखिए सुबह से शाम तक आप तमाम लोगों से मिलते हैं, आपके नजरिए से कई लोग सही और कई गलत लगते होंगे लेकिन क्या आपने देखा है कि कोई सामने से आकर कहे कि- 'हां, मैं गलत हूं और मैं अपने में सुधार करूंगा ताकि किसी को मुझसे दिक्कत नहीं हो.' नहीं न, सब अपनी कहानी में सही होते हैं. आप भी सोचकर देखिए अपनी हर कहानी में आप भी खुद को सही मानते मिलेंगे.
तो जब सब सही हैं दुनिया में तो फिर गलत कौन है? आखिर इतनी परेशानिया हैं हमारी पर्सनल लेवल पर और सामाजिक लेवल पर तो कहीं न कहीं कोई न कोई गलत पक्ष में तो है? अगर सब लोग इस बात को समझ लें तो दुनिया की सारी समस्याएं एक झटके में खत्म हो जाएं...लेकिन क्या ऐसा होता दिख रहा? नहीं. क्या है कारण और क्या है समााधान. चलिए थोड़ा इसे आध्यात्मिक पक्ष से समझने की कोशिश करते हैं...
12वीं सदी में ही रूमी ने लिख दिया था-
''पता है
यहां से बहुत दूर, गलत और सही के पार,
एक मैदान है.. मैं वहां मिलूंगा तुझे…
तुम, तुमसे मिलना, तुम्हारे बारे में सोचना,
सारी दुनिया भर के काम छोड़ कर तुमसे मिलना,
जो कभी नहीं किया, वो करना… सब,
सब गलत है…
लेकिन अगर गलत है तो गलत लग क्यूं नहीं रहा..
कहां है ये सही और गलत…? जहां मैं हूं, वहां से कुछ सफ़ेद या काला नहीं है…
सब कुछ, कई रंगों का है, सब कुछ, हर पल , नया रंग ओढ़ता है..
सब कुछ…. सही भी है, और गलत भी…
मेरी सारी दुनिया ही, उस सही और गलत के पार का मैदान है…
और यहां, इस मैदान में, मुझे वो सब लोग मिलते हैं, जो मेरी तरह, सबरंग में देखते हैं..
सब की आंखें ख़राब हैं… दिमाग भी… सब एक जैसे हैं…''
हम अक्सर खुद को इस उलझन में पाते हैं कि जीवन में क्या चीजें सही दिशा में हैं या नहीं? साथ ही ये भी कि सही क्या है और गलत क्या है? हमें किस राह पर होना चाहिए? हमसे जुड़ी चीजें कहीं गलत राह पर तो नहीं हैं? आपको इन उलझनों का जवाब खुद खोजना होगा. अपने इर्द-गिर्द खोजना होगा. दूसरों के अनुभवों से आपकी जिंदगी के सवाल हल नहीं होंगे. आपको अपने जीवन को सरलता की ओर ले जाना होगा.
हां, आप दूसरों की जिंदगी की समस्याओं और उनके समाधान को कॉपी नहीं कर सकते लेकिन उनके अनुभवों से जरूर सीख सकते हैं. कैसे? सरल होकर, खुद को थोड़ा हल्का करके... आखिर ज्यादा बोझ लेकर जाना कहां है? ज्यादा लोड लेकर करना क्या है?
स्वेट माडर्न लिखते हैं-
'मैं प्रकृति के निकट रहने का यत्न करता हूं. अपने जीवन में उसका अनुकरण करता हूं. फल यह मिलता है कि खूब निद्रा आती है. पाचन शक्ति भी बनी रहती है. सभी साम्थर्य अपने पूरे वेग में रहता है. सरलता और परिश्रम का यही सबसे बड़ा इनाम है...'
इसका जवाब आपको खुद खोजना होगा. जीवन में सही गलत में उलझने की बजाय सरल रास्ते आपको हमेशा बेहतरी की ओर ले जाएंगे. स्वामी विवेकानंद कहते हैं-
'जो भी चीज आपको शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाती हैं, उसे जहर समझकर अस्वीकार कर दीजिए.'
वैसे, भी सही-गलत का ये सवाल कोई आज का नहीं है, सदियों पहले भी इंसान इसी उधेर-बुन में था. किसी ने एक संत के दरबार में ये सवाल पूछा. संत ने चेहरे पर चिर शांति और मुस्कान लाते हुए कहा-
'सही-गलत में फर्क करना इतना मुश्किल तो नहीं है. जो करने से दिल का बोझ बढ़े वो गलत और जो करने से दिल को इत्मीनान आए वो सही...'
यानी तब तक खाओ जब तक कि आपका पेट 80 प्रतिशत भरा न हो. जापानी मानते हैं कि ये मंत्र है मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने का और लंबी आयु का.
जापानी लोग दुनिया में सबसे ज्यादा जीने वाले लोग माने जाते हैं. ये ऐसे ही संभव नहीं हुआ. इतिहास की ओर झांककर देखा जाए तो उन्होंने समय के साथ अपनी आदतों में बदलाव किया. जैसे- छोटी प्लेटों में खाना खाना, धीरे-धीरे खाना, सब्जियों और सलाद पर फोकस करना, खाना खाते समय शरीर के संकेतों पर ध्यान देना यानी जरूरत से ज़्यादा न खाने की लिमिट लगाना. जापान के ओकिनावा में ज्यादातर लोग इस डाइट को फॉलो करते हैं. ओकिनावा में हृदय रोग, कैंसर, और स्ट्रोक से होने वाली बीमारियों की दर कम है. यहां के लोग लंबा जीवन जीते हैं.
भोजन का संतुलन हमारे शरीर के लिए कितना अहम है इसका जिक्र भगवद्गीता में भी है. भोजन के बारे में गीता में बताया गया है कि भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है. ये तीन प्रकार हैं - सत्व, रजोगुण, और तामसिक.
भगवद्गीता में बताया गया है कि आहार शुद्ध होने पर ही अंत:करण शुद्ध होता है.
शाकाहार और मांसाहार में क्या अच्छा है और क्या बुरा है? इस बहस में पड़े बिना यहां ये देखना जरूरी है कि दुनिया में भोजन को लेकर क्या व्यवहार है इंसान का? आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो दुनिया में सिर्फ 5 फीसदी लोग विशुद्ध शाकाहारी हैं. बाकी के 95 फीसदी लोग किसी न किसी रूप में मांसाहार करते हैं. भारत में भोजन को लेकर बहस लंबे समय से होती आ रही है. खाने के बारे में बात करना वैसे तो लोग जरूरी नहीं समझते लेकिन जरूरी है क्योंकि तमाम मेडिकल रिसर्च और पौराणिक ज्ञान इसे हमारे मानसिक और शारीरिक हेल्थ से जोड़कर ही देखते हैं इसलिए बात करना जरूरी हो जाता है.
भारत के आंकड़ों को अगर देखें तो यहां 24 फीसदी लोग शाकाहारी हैं, 9 फीसदी लोग वेगन हैं यानी मांसाहार के साथ-साथ दूध से बनी चीजें भी नहीं खाते. प्यू रिसर्च का एक डेटा कहता है कि 81 फीसदी इंडियन अपने खाने में मांस यानी मीट को शामिल नहीं करते, 8 फीसदी लोग pescatarians हैं यानी मीट नहीं खाते, मछली खाते हैं, एक अच्छी-खासी आबादी eggitarian भी है यानी जो लोग मांस और मछली नहीं खाते लेकिन अंडे को भोजन में शामिल रखते हैं. आप क्या खाते हैं इसका चयन आपका ही अधिकार है लेकिन जो आपके मन को तसल्ली दे, आत्मा को स्वीकार हो वही आपका भोजन हो.
अध्यात्मिक गुरु ओशो मानते थे कि अगर आप चिंता के भाव में भोजन कर रहे हैं तो मुमकिन है कि वह खाना आपके लिए जहर का काम करे. वहीं अगर आप पूरे आनंद भाव से खा रहे हैं, तो कई बार संभावना भी है कि खाने में मिला जहर भी आप पर असर ना करे. ओशो भोजन को लेकर कहते थे कि एक स्वस्थ शरीर के लिए ये जरूरी नहीं है कि आप क्या खा रहे हो, जरूरी ये है कि आप किस मनोदशा में खा रहे हो. खाते वक्त आपका चित्त कैसा है, मतलब कि भोजन के वक्त आप खुश हो, उदास हो, क्रोधित हो या फिर किसी चिंता में हो. ओशो के मुताबिक आप जिस मनोदशा में भोजन करते हैं उसका वैसा ही असर आपकी सेहत और शरीर पर पड़ता है.
यहां बुद्धा डाइट का जिक्र करना भी जरूरी है. बौद्ध आहार मुख्य रूप से शाकाहारी होता है, जिसमें पौधे आधारित खाद्य पदार्थ शामिल हैं और मांस, मछली, मुर्गी, प्याज, लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों को शामिल नहीं किया गया है. बौद्ध आहार का मूल सिद्धांत स्वस्थ भोजन, सही समय पर और सही मात्रा में भोजन को शामिल करके एक स्वस्थ जीवन शैली जीना है.
भगवद् गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि पत्ते, फल और पानी खाना भी हमें स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त है.
खाने की बात हो गई तो पीने पर आते हैं. जल जीवन के लिए जरूरी है लेकिन अंग्रेजी के शब्द Drink को कोई पानी पीने से जोड़ता ही नहीं. इसका मतलब सीधे-सीधे शराब पीने से लगा लिया जाता है. इसके आंकड़े अगर देखें तो भारत और दुनियाभर में शराब पीने वालों की तादाद असंख्य है.
सरकारी आंकड़े कहते हैं कि भारत में 21 फीसदी पुरूष और 2 फीसदी महिलाएं शराब पीने के आदी हैं, दुनिया का आंकड़ा तो इससे भी ज्यादा है. एक शोध के मुताबिक भारत में हर आदमी पर औसतन 4.9 लीटर शराब की खपत है, इसमें जो नहीं पीते उनकी कमी पीने वाले पूरी करते हैं. दुनिया का आंकड़ा और भी ज्यादा है यानी हर व्यक्ति का औसन 5.5 लीटर. शराब, ड्रग्स और नशे से बीमार होने वालों की संख्या तो असंख्य है लेकिन हर साल दुनिया में 9 लाख लोग अल्कोहल के कारण अपनी जान गंवाते हैं.
मतलब आप क्या खाते हैं, क्या पीते हैं इसका चयन बहुत सावधानी से करना जरूरी है क्योंकि यही चीजें आपका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य तय करेंगी.
इस धरती पर मौजूद बाकी जीवों के बारे में तो हम नहीं जानते लेकिन हम इंसानों के जीवन में बाहर से जितना तूफान दिखता है अंदर उससे भी ज्यादा हलचल मची हुई है. मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक इंसान चाहे बोले न या मौन रहे लेकिन उसके मन में विचारों की आंधी है. शोध के अनुसार, एक औसत व्यक्ति के मन में प्रतिदिन लगभग 60,000 विचार आते हैं। इनमें से अधिकांश नकारात्मक होते हैं. जो इनसे अंदर ही अंदर लड़कर इनपर हावी हो जाता है उसका दिन सकारात्मक बीत जाता है और जिनपर ये विचार हावी हो जाते हैं उनका दिन नकारात्मक बीतता है.
बेशक हम इंसान सामाजिक प्राणी हैं लेकिन हमारा बेस एकल है, यानी हमारे अधिकांश अनुभव एकांत के होते हैं. भले ही हम भीड़ में रहते हैं लेकिन जिंदगी के अधिकांश हालातों को हम अकेले ही फेस करते हैं. कई बार हम बहुत बेचैनी महसूस करते हैं, कई बार अपने जीवन में चल रही चीजों को लेकर और कई बार अपने आसपास चल रहीं चीजों को लेकर... कभी निराशा, कभी उलझन महसूस होती है तो कभी चीजें सुलझती हुई भी लगती हैं. हमारी जिंदगी में चल रहीं ज्यादातर चीजें हमारी मनोदशा को प्रभावित करती हैं.
ओशो कहते हैं- 'हम जीते हैं भीतर से, हमारे जीने के सारे गहरे आधार भीतर हैं. इसलिए जो भीतर है, वही बाहर फैल जाता है. भीतर सदा ही बाहर को जीत लैता है. ओवरपावर कर लेता है. इसलिए जब आपको बाहर नर्क दिखाई पड़े तो बहुत खोज करना. पाएंगे कि भीतर नर्क है. बाहर सिर्फ रिफ्लेक्शन है, बाहर सिर्फ प्रतिफलन है. और जब बाहर स्वर्ग दिखाई पड़े, तब भी भीतर देखना. तो पाएंगे कि भीतर स्वर्ग है. बाहर सिर्फ प्रतिफलन है. '
यानी, हम अपने विचारों की दिशा बदलकर अपने हालातों को काफी हद तक सकारात्मक बना सकते हैं. हालातों से लड़कर या तो हालात को बदला जा सकता है या उसे स्वीकार करके अपनी मनोदशा को. दोनों ही स्थितियों में आप उलझन वाले हालात से खुद को बेहतर महसूस करेंगे. क्योंकि हालातों को जीतने से पहले आपको अपने मन को जीतना होगा.
मतलब जीवन है तो समस्याएं लगी ही रहेंगी, जब तक जीवन है तब तक लगी रहेंगी. ऐसे में हमें खुद पर काम करना होगा ताकि शांति के साथ खुद को मौका दे सकें जीवन को आनंद के साथ बिताने का.
पश्चिमी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैसलो कहता है- 'व्यक्ति के जीवन में स्वर्ग का क्षण वही है, जो उसके व्यक्तित्व के शिखर का क्षण है. जिस क्षण कोई व्यक्ति जो हो सकता है, उसके होने के शिखर पर पहुंच जाता है, उसके आगे कोई उपाय नहीं बचता. जिसके आगे कोई मार्ग नहीं बचता. जिसके आगे कोई ऊंचाई नहीं बचती. जब भी कोई व्यक्ति अपने भीतर के पीक को छू लेता है तभी समाधि, यानी एक्सटैसी अनुभव करता है.'
आखिरकार जीवन की बात वहीं आकर टिक जाती है जहां कबीर कहते हैं- 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत'
ये जो बाहर खुदा से डर रहे हैं,
बहुत कुछ दिल के अंदर कर रहे हैं,
यहां पर कोई दरियादिल नहीं है,
सब अपना-अपना पानी भर रहे हैं...
बात किसी धर्म की नहीं है समाज की है, इंसानियत की है, इंसान की है.
गजब का नजारा है... सुबह-सुबह अखबार देखा तो रावण दहन करने वालों का रेला हर जगह मेन पेज पर दिखा. हर शहर-हर गली में तथाकथित प्रमुख लोग खासकर नेता जी लोगों ने रावण दहन की रस्म जमकर निभाई और खूब तीर छोड़े. इतनी तस्वीरें-इतनी तस्वीरें एक बार तो देखकर लगा कि रावण खत्म हो गया होगा, उसकी विचारधारा धरती से मिट गई होगी. समाज एकदम सेफ टाइप हो चुका होगा. सही का विजयदशमी टाइप. ऐसा लगा कि समाज से रावणों का अंत हो चुका होगा और रामराज्य वाला सीन आगे के पन्नों पर दिखेगा.
लेकिन...
जैसे ही अंदर के पन्नों पर पहुंचा राम तो नहीं रावणों की करतूतों की खबरें ही हर पन्ने पर छाई दिखी. कही हत्या, कहीं लूट, कहीं बलात्कार, कहीं ठगी... इसके अलावा तो कुछ था ही नहीं. बच्चा आया उसे स्कूल के किसी फंक्शन के लिए 6 गुड न्यूज चाहिए थे बेचारे ने सारे अखबार पलट डाले, वेबसाइट्स पलट डाले लेकिन 6 गुड न्यूज नहीं निकाल सका. आखिर ऐसा क्यों है कि हमारा जो समाज रावणों को दहन करने की रेस की फोटो खिंचाते दिख रहा है वहां राम की इतनी कमी और रावणों की इतनी अधिकता है? या तो समाज के गणित में लोचा है या इंसान और इंसानियत में कुछ केमिकल लोचा?
हर जगह तो श्रद्धा दिख रही है फिर इतनी वहशत क्यों है. क्या हम केवल ऊपर-ऊपर धार्मिक होने के दिखावे करने में जुटे हुए हैं? मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भक्तों का रेला है, हर जगह लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं, एंट्री तक कर पाना मुश्किल साबित हो रहा है. बाबाओं की कथाओं को सुनने के लिए बसें-रेल और ट्रक-ट्रैक्टरों में लोट ठूंस-ठूंसकर जा रहे हैं, हर कोई भक्ति के रंग में रंगा है तो ये सब समाज में क्यों नहीं दिख रहा है. अखबार कुकर्मों से क्यों भरे हुए हैं? क्यों नहीं अखबारों को पढ़कर रामराज्य वाली फीलिंग आ रही है. क्या ये समाज के रूप में हमारा फेल्योर नहीं है?
बस इतना ही कह सकते हैं...
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भक्तों का रेला है
रावण जलाने वालों में ठेलमठेला है...
लेकिन अखबार के हर पन्ने रावणों के कुकर्मों से भरे पड़े हैं...
आखिर ये कलयुग नहीं तो और कौन सा युग है?
ओरिजिन ऑफ स्पेशिज में 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट...' की अपनी थ्योरी लिखते हुए डार्विन लिखते हैं-
'हर प्राणी को खाने के लिए भोजन व रहने के लिए स्थान चाहिए. उन्हें उन प्राणियों से बचाव के लिए जगह चाहिए जो मारना चाहते हैं और उन प्राणियों का इलाका चाहिए जहां उनके शिकार प्राणी या वनस्पति उपलब्ध होते हैं. इस प्रकार कब्जेदार व कब्जा करने वाले तथा आक्रमणकारी और बचाव करने वाले के बीच निरंतर जंग चलती रहती है. इसमें जो जहां भारी पड़ता है वही सर्वाइव करता है. बाकी या तो सिकुड़ते चले जाते हैं या उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है.'
यही थ्योरी दुनिया पर, जिंदगी पर भी काम करती है. सतह के नीचे हर किसी का संघर्ष चल रहा है, चाहे वो इंसान हो, कोई और जीव हो, पेड़-पौधे हों, पानी के अंदर के जीव हों या ब्रह्मांड का कोई और तत्व...
डार्विन लिखते हैं- हर प्राणी एक काल में अपनी तेजी से वृद्धि करता है और एक काल में उसका तेजी से विनाश होता है. हर किसी को अपने स्तर पर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते रहना पड़ता है. यही संसार के चलने, परिवर्तनशील होने और बने रहने का विज्ञान है, यही प्रकृति का विज्ञान है.
संस्कृत का एक श्लोक है- परिवर्तनमेव स्थिरमस्ति...
यानी परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है. यानी आपका ब्रह्मांड और ये जीवन लगातार बदल रहा है, अगर आप इसे अपनाते हैं तो इसका मतलब है कि आप इसके साथ चल रहे हैं. आप हो रहे बदलावों को अपना रहे हैं और वर्तमान समय के अनुरूप खुद को ढालते जा रहे हैं. यानी कि आप ब्रह्मांड के नियमों के अनुरूप खुद को ले जा पाने में सक्षम हैं. यही है सर्वाइवल की थ्योरी... जिसके दम पर 6 हजार साल से इंसान इस धरती पर अपने अस्तित्व की रक्षा करने में या अपनी दुनिया को विस्तारित करते जाने में सफल रहा है...
धरती शांत दिखती है लेकिन अंदर गर्म लावा भरते रहता है. और एक दिन दुनिया फूटा हुआ ज्वालामुखी देखती है, ऐसा ही हमारे मन के साथ भी है. ऊपर से शांत दिख रहे लोग अंदर से भरे हुए हैं, उनका गुस्सा निकलता है कभी सड़कों पर रोड रेज के रूप में, कभी हाई ब्लड प्रेशर अटैक के रूप में और कभी खुदकुशी के रूप में... ये मन की ज्वालामुखी इतनी प्रबल होती है कि फूट जाने तक किसी को भनक भी नहीं लगने देती...
आखिर क्यों है ऐसा? क्योंकि हम अपने माइंड का मैनेजमेंट नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि हम झूठ की जिंदगी को व्यवहारिकता पर हावी होने दे रहे हैं. क्योंकि इंसान आज कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रहा है. आर्थिक समस्याएं तब भी थीं यानी हमसे पहले की पीढ़ियों में भी. लेकिन तब समाज था, परिवार था, लोग थे अपने... जिनसे खुलकर अपने मन की समस्या बताई जा सकती थी. जो पूरी कोशिश करते थे उन्हें हल करने का. आज समस्याएं सिर्फ अपनी है... समाज का लोप हो गया, रिश्ते सिर्फ औपचारिकता भर रह गए... लोग सोशल मीडिया पर रिश्तों के भ्रम में उलझे हुए हैं. जहां एक-दो नहीं हजारों में 'अपने' हैं, जिनके सामने खुद को सफल साबित करने के लिए हम दिनभर फोटोशॉप में बिजी हैं. लेकिन एक बार ईमानदारी से सोचकर देखिए वहां हजारों की भीड़ में कितने अपने हैं?
आप आज तमाम सोशल ग्रुप्स में जुड़े हुए हैं. वहां गौर से देखिए कि किसी की समस्या की सूचना मिलने पर लोग क्या करते हैं. जहां दिनभर किसी न किसी के साथ होने वाली समस्याओं का जिक्र आता है. यहां तक कि किसी की मौत पर भी लोग सिर्फ Oh, Sorry to hear और RIP... लिखकर अपनी जिम्मेदारियां निभा ले रहे हैं. इससे आगे आपकी समस्याएं सिर्फ आपकी हैं.. इसलिए सोशल पर दिखने के लिए मत सोशल बनिए, खुद के आसपास ऑफलाइन सोसाइटी डेवलप करने पर फोकस करिए. वहां हजारों लोग तो नहीं होंगे लेकिन असल जरूरत के वक्त दो चार लोग जो जरूर आपके आसपास मौजूद होंगे.
अगर ये संभव नहीं दिख रहा हो तो कम से कम खुद से दोस्ती कीजिए और खुद का साथ एंजॉय कीजिए. अच्छे कामों में खुद को झोंक दीजिए. अच्छी किताबों से दोस्ती कीजिए, मजेदार कामों से जुड़ जाइए और खुद को ऐसी शख्सियत के रूप में ढाल लीजिए कि मन में सिर्फ आनंद का वास हो और कोई नकारात्मकता घुस ही न पाए... यही आनंदित जीवन का राज है. यही माइंड मैनेजमेंट का राज है. आप जीवन की वास्तविकताओं के जितने ही करीब होंगे उतने ही सहज और नम्र होंगे. फिर आप किसी से कभी न तो बदतमीजी करते खुद को पाएंगे और न ही बिन बुलाई मुश्किलों को न्योता देते. जबतक संभव हो शांत बने रहने पर फोकस करेंगे.
मतलब ये संसार महाभारत के कुरुक्षेत्र की भांति युद्ध का मैदान है. यहां कर्मयुद्ध तो करना ही पड़ेगा. आप चाहें या नहीं. और कोई चारा ही नहीं है.
यह दुनिया ऐसी ही है. यहां कमजोरी अभिशाप है. प्रकृति भी कमजोर जीवों को जिलाए रखने के पक्ष में नहीं होती. चार्ल्स डार्विन का सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सिद्धांत भी यही कहता है.
कृष्ण से बड़ा कोई पूर्ण पुरुष नहीं. बचपन जिया तो ऐसा कि हरेक मां ने अपने बेटे को कन्हैया कहना शुरू कर दिया, जवानी जी तो ऐसी कि प्रेम की मिसा...